19 मार्च, 2018

कविता कृष्‍णपल्‍लवी की कविताएं

कविता कृष्णपल्लवी

एक 

नगर में बर्बर

नगर द्वार पर बर्बरों की प्रतीक्षा करते
डरे हुए लोगों ने शाम ढले
वापस लौटकर पाया कि
बर्बरों के गिरोह शहर में
पहले से ही मौजूद हैं।
आश्‍चर्य के साथ उन्‍होंने पाया कि
धीरे-धीरे अपनी संख्‍या और आक्रामक क्षमता बढ़ाते
बैक्‍टीरिया की तरह वे उनके बीच
पहले से ही अपनी जड़ें मजबूत कर रहे थे
और उनकी सरगर्मियाँ लगातार जारी थीं
और अब वे खुलकर अपने मंसूबों को
अंजाम दे रहे हैं
बाहरी बर्बरों को भी न्‍यौतते हुए
और फिर भी शान्ति, बंधुत्‍व, न्‍याय
और प्रगति की बातें करते हुए।
चित्‍त उचाट पड़ा है थका-हारा नगर।
जहाँ बच्‍चे खेला करते थे
वहाँ कुछ उदास खजुहे कुत्‍ते बैठे हैं
और नालियों में कुछ सूअर लेटे हैं।
बंद खिड़कियों की झिरियों से छनकर
रिस रही है पीली रोशनी
और बच्‍चों की दबी हुई आवाज़ें।
नील-लोहित संध्‍या लपेट चुकी है
अँधेरे की चादर अपने इर्द गिर्द
और एक बूढ़ा यात्री घूमता-भटकता ठौर-ठौर
एक फटी-पुरानी डायरी में
अपने इम्‍प्रेशंस दर्ज करता जा रहा है।
शायद उसे किसी ठिकाने की तलाश है
या वह लेकर आया है
भविष्‍य के बारे में सोचने वाले
चिन्‍तातुर विवेकात्‍माओं के लिए
इतिहास का कोई गुप्‍त सन्‍देश।
*


दो 
मसखरा-2014

मसखरा सिंहासन पर बैठा
तरह-तरह के करतब दिखाता है
दरबारी हँसते हैं तालियाँ पीट-पीटकर
और डरे हुए भद्र नागरिक उनका साथ देते हैं।
वे जानते हैं, मसखरा एक हत्‍यारा है
और दरबार में खून के चहबच्‍चों के ऊपर
बिछी हुई है लाल कालीन।
मसखरे का सबसे प्रिय शगल है
सड़कों पर युगपुरुष बनकर निकलने का स्‍वांग रचना
विशाल भव्‍य मंचों से अच्‍छे दिनों की घोषणा करना
जिन्‍हें सुनकर सम्‍मोहित भीड़ नारे लगाने लगती है
सदगृहस्‍थ भले लोग डर जाते हैं
सयाने अपनी हिफाजत की जुगत भिड़ाने लगते हैं
और विवेकवान लोग चिन्‍तापूर्वक आने वाले दिनों की
तबाहियों के बारे में सोचने लगते हैं।
सदियों पहले जो बर्बर हमलावर बनकर आये थे
वे अतिथि बनकर आ रहे हैं
मसखरे ने ऐसा जादू चलाया है।
मसखरा अपने मामूली से महान बनने के अगणित संस्‍मरण सुनाता है
वह चाँद को तिलस्‍मी रस्‍सी फेंककर
धरती पर खींच लाने के दावे करता है।
मसखरा शब्‍दों से खेलता है
और अलंकार-वैचित्र्य की झड़ी लगाता है।
शब्‍द हों, या परिधान या लूट और दमन के विधान
या सामूहिक नरसंहार रचने के लिए
विकसित किया गया संकेत विज्ञान
मसखरा सबकुछ सुगढ़-परिष्कृत ढंग से करता है
और क्रूरता का नया सौन्‍दर्यशास्‍त्र रचता है।
सर्कस का मालिक बन बैठा है मसखरा,
जनमत उसके साथ है
ऐसा बताने के गणितीय तर्क हैं उसके पास।
फिर भी व्‍यग्र-उद्विग्‍न है मसखरा।
दुर्ग-नगर सरीखे इस विशाल बंद सर्कस पण्‍डाल के बाहर
अभी निचाट सन्‍नाटा है, चिलकती धूप है
और यहाँ-वहाँ उठते कुछ धूल के बगूले हैं।
मसखरा रहस्‍यमय सन्‍नाटे को नहीं समझता।
मसखरा बच्‍चे की उस हँसी तक को
बर्दाश्‍त नहीं कर पाता जिसमें विवशता नहीं होती,
भय नहीं होता।
तमाम आश्‍वस्तियों के बावजूद
अतीत के प्रेत सताते रहते हैं मसखरे को।
वह डरा रहता है।







तीन 

एक शाम : एक दृश्यचित्र
(मुक्तिबोध और शमशेर को एक साथ समर्पित)

ढल चुकी है शाम
अँधेरे में गर्क हो चुकी है पश्चिमी क्षितिज पर लालिमा ।
ज़िंदगी पर झुका हुआ है
गहराता हुआ फासिस्ट अँधेरा
जिससे बेफ़िक्र बच्चे अभी भी खेल रहे हैं
इस विशाल पार्क के खुलेपन में ।
काले जल के किनारे
झुरमुटों में कुछ जोड़े
आलिंगनबद्ध-निश्शब्द ।
बत्तखें बैठी हैं आपस में सटकर-दुबककर , ऊँघती हुई ,
न छेड़े जाने की याचना के साथ ।
चाँदनी विक्षिप्त , नीरस और उदास ।
बुद्धिजीवी जा रहे हैं अपने अध्ययन-कक्षों में
और उनकी पत्नियाँ किचन में ।
कुछ और बस्तियों को ज़मींदोज़ करने की
तैयारी हो रही है नगर निगम के कार्यालय में ,
हज़ारों कारपोरेट बोर्ड रूमों में नई छंटनियों की
रणनीतियाँ बन रही है ,
दुनिया के कई हिस्सों में फिर से बमबारी हो रही है ,
कुछ मंत्रणागृहों में पूँजी निवेश के
नए क़रारों पर दस्तख़त हो रहे हैं
और कुछ में हत्यारे और बलात्कारी अपनी अगली कार्रवाइयों के बारे में
गुफ़्तगू कर रहे हैं ।
यहीं बैठे हैं हम कुछ लोग यह सोचते हुए
कि 'आलोचना के शस्त्र' को इतिहास कैसे बदलेगा फिर से
'शस्त्र द्वारा आलोचना' के रूप में ।
बेशक तबतक रोज़मर्रे की लड़ाइयों में शिरकत और दूरवर्ती लक्ष्य की
याददिहानी के साथ हम अमल करेंगे
पाब्लो नेरूदा की नसीहत पर ,
प्रतीक्षारत कोरे कागज़ को
अपने रक्त और अंधकार से भरेंगे
ज़िंदगी जैसी विह्वल और मलिन कवितायें लिखकर ,
हारी हुई लड़ाइयों की याद में ,
जीतने के लिए लड़ने की तैयारियों में मशगूल ।
'जो चीज़ों के "बुरे स्वाद" से दूर रहेंगे
वे एकदिन बर्फ पर औंधे मुँह गिर जाएंगे'
-- कहा था यह भी नेरूदा ने ही कभी ।
*


चार 

सबसे बड़ी बात है सच को जानना एक साथ मिलकर

जो लोहा गलाते हैं
और धरती खोदकर खनिज निकालते हैं
और अनाज उपजाते हैं,
उनकी ज़ि‍न्‍दगी कब्रिस्‍तान जैसी होती है,
आँखें पथरायी रहती हैं
और सपनों को दीमक चाटते रहते हैं
और सूझ-बूझ को लकवा मारे रहता है
जबतक कि वे बँटे रहते हैं खण्‍ड-खण्‍ड में
जाति, धर्म और इलाके के नाम पर
और जबतक ऐसे मर्द खुद ही औरतों को
दबाते रहते हैं।
जैसे ही गिरती हैं ये दीवारें
दुनिया की सारी सम्‍पदा के निर्माताओं को
अहसास हो जाता है अपनी गुलामी का
और अपनी अपरम्‍पार ताकत का।
फिर वे उठ खड़े होते हैं
और एक विशाल लोहे की झाड़ू थाम्‍हे
अपनी बलशाली भुजाओं में
अनाचार-अत्‍याचार-लूट और गुलामी की
सफाई करते हैं पूरी पृथ्‍वी से
और उसे एक गठरी की तरह बाँधकर पीठपर
एक सुन्‍दर, मानवीय, शोषणमुक्‍त भविष्‍य की यात्रा पर
निकल पड़ते हैं।
हालात बदले जा सकते हैं निश्‍चय ही
यदि हम सच को जान लें
और सारे भ्रमजालों को भी
एक साथ मिलकर।
*


पांच 

अख़बार

इतने सारे,
इतने सारे पेड़ों को काटते हैं लगातार
इतने सारे कारख़ानों में
इतने सारे मज़दूरों की श्रमशक्ति को निचोड़कर
तैयार करते हैं इतना सारा काग़ज
जिनपर दिन-रात चलते छापाखाने
छापते हैं इतना सारा झूठ
रोज़ सुबह इतने सारे दिमागों में उड़ेल देने के लिए।
इतने सारे पेड़ कटते हैं
झूठ की ख़ातिर।
इतनी सारी मशीनें चलती हैं
झूठ की ख़ातिर।
इतने सारे लोग खटते हैं महज़ ज़ि‍न्‍दा रहने के लिए
झूठ की ख़ातिर
ताकि लोग पेड़ बन जायें,
ताकि लोग मशीनों के कल पुर्जे़ बन जायें,
ताकि लोग, जो चल रहा है उसे
शाश्‍वत सत्‍य की तरह स्‍वीकार कर लें।
लेकिन लोग हैं कि सोचने की आदत
छोड़ नहीं पाते
और शाश्‍वत सत्‍य का मिथक
टूटता रहता है बार-बार
और वर्चस्‍व को कभी नहीं मिल पाता है अमरत्‍व।





छ:

नालन्दा के गिद्ध

गिद्धों ने
नालन्दा के परिसर में स्थायी बसेरा बना लिया है।
पुस्तकालय में गिद्ध,
अध्ययन कक्षों और सभागारों में गिद्ध,
छापाखानों में गिद्ध, सूचना केन्द्रों में गिद्ध,
नाट्यशालाओं और कला-वीथिकाओं में गिद्ध।
गिद्ध नालन्दा से उड़ते हैं
बस्तियों की ओर
वहाँ वे जीवित संवेदनाओं, विश्वासों और आशाओं
को लाशों की तरह चीथते हैं,
पराजित घायलों और मृत योद्धाओं पर टूट पड़ते हैं।
फिर गिद्ध मार्क्सवाद से लेकर गाँधीवाद तक की भाषा में
मानवीय सरोकारों के प्रति गहरी चिन्ता जाहिर करते हैं
और तमाम बस्तियों को
अफ़वाहों, शक़-सन्देहों और तोहमतों की
बीट से भरते हुए
नालन्दा की खोहों में वापस लौट जाते हैं।


सात 

हमला हो चुका है !

बर्बर हमलावरों ने हमला बोल दिया है।
आगे बढ़ रहे हैं वे लगातार
सृजन, विचारों, कल्‍पनाओं और स्वप्नों को रौंदते हुए
तर्क की मृत्यु की घोषणा करते हुए
धर्मध्वजा लहराते हुए
शिक्षा, कला, संस्कृति और जन संचार के
सभी प्रतिष्ठानों पर कब्जा जमाते हुए
उन्हें जेलों में बदलते हुए
मिथकों को इतिहास बनाते हुए
ज़ुबानों पर ताले लगाते हुए
विवेक की गुप्तचरी करते हुए
विवेक के पक्ष में मुख़र आवाज़ों की गुप्त हत्याएँ करते हुए,
वास्तविक दुनिया में वास्तविक और आभासी दुनिया में शाब्दिक हिंसा के
नये-नये तरीके ईजाद करते हुए।
मध्ययुगीन अंधकार में लिपटे हुए
वित्तीय पूँजी के प्यादे
हर तरह की उर्वरता, हरेपन, और सपनों को
जलाकर राख़ कर देने का मंसूबा लिए
हर बस्ती के आसपास
बारूदी सुरंगे बिछा रहे हैं।
याचनाओं, अनुरोधों से उन्‍हें रोका नहीं जा सकता।
चुप्पियों से बचाव नामुमकिन है।
दो ही रास्‍ते हैं --
या तो हमें घुटनों के बल बैठकर
उनके सफेद दस्‍ताने चढ़े खूनी हाथों को चूम लेना होगा
फिर पुरस्कृत होकर उस जुलूस में शामिल हो जाना होगा
जो पहले रात में निकलता था
और अ‍ब दिन के उजाले में निकलता है,
जिसमें हत्यारों के साथ चलते हैं
विचारक और सुधी कलावंत गण,
या फिर हमें पकड़े हुए एक-दूसरे के हाथ
तमाम आत्मिक और भौतिक सम्पदाओं के निर्माताओं के साथ
खड़ा होना होगा तनकर, उनके ऐन सामने
उनकी राह रोककर।
बेशक़, मुमकिन है कि हम मारे जायें
इस कोशिश में
लेकिन हमारी वह मौत भी एक चोट होगी
बर्बरों पर मारक,
हमारी हार भी यदि हो तो
आने वाले जीत के दिनों की भविष्यवाणी
दर्ज़ करेगी वक्त की छाती पर।
दुबककर, चुप रहकर, माफी माँगकर या
अराजनीतिक कला का पैरोकार बनकर जीना
यानी अपनी आने वाली पीढ़ि‍यों की नज़रों में
बन जाना हरामी, कायर और कमीना।
जीवन की भविष्योन्मुख यात्रा के पक्ष में
लड़ते हुए मरना
यानी ज़‍ि‍न्दगी की खूबसूरती को तृप्त होकर जीना
और आने वाली पीढ़ि‍यों में जीत का विश्वास भरना।
विकल्प अधिक नहीं हैं
चुनना होगा इन्हीं दोनों में से किसी एक को हमें।







आठ 

कुछ निरर्थक काम जैसे कि ...

सार्थक के साथ हरदम
करती रहती हूँ कुछ निरर्थक भी ।
अज्ञात के रहस्यों को जानने की
कोशिश करते हुए
स्वयं ही कुछ रहस्य रचती रहती हूँ ।
जैसे दे ही दूँ एक मिसाल, कि
निजी डायरियाँ भी लिखती हूँ
छिपाकर पूरी दुनिया से
और उन्हें कहीं दबा देती हूँ
कभी सुदूर रेगिस्तान में
रेत के किसी टीले के नीचे,
तो कभी किसी ग्लेशिअर के पास
या खोद कर गाड़ देती हूँ
उत्तर-पूर्व के किसी दुर्गम वर्षा-वन में ।

मेरे मरने के बहुत दिनों बाद, सदियों बाद,
यदि मिलेंगी किसी को वे डायरियाँ
तो पैग़म्बरों, क़ातिलों, नायकों, कवियों,
लकड़हारों, संगीत-निर्माताओं, गोताखोरों,
चिंतकों,सब्ज़ीफ़रोशों, न्यायाधीशों, प्रेमियों,
गली के शोहदों, रंगसाज़ों, पागलों, प्रोफ़ेसरों
और न जाने कितने लोगों के बारे में
रहस्यमय, या आश्चर्यजनक, या विस्फोटक
या अबूझ जानकारियाँ देंगी
पर वे जानकारियाँ तब
इतनी पुरानी हो चुकी रहेंगी कि
बस कोई ऐतिहासिक उपन्यास लिखने के
काम आ सकेंगी ।

उनमें मेरे भी वे सभी राज होंगे
जिन्हें जानने के लिए मरते रहे
मेरे शुभचिंतक और मेरे दुश्मन
और जिनके बारे में मेरे दोस्तों ने
कभी कुछ नहीं पूछा ।
उनमें मेरी तमाम अधूरी यात्राओं, खंडित स्वप्नों,
पलायनों, पाखंडों, अधूरे और विफल और अव्यक्त प्रेमों,
कुछ गुप्त कारगुजारियों,
विश्वासघातों और विचलनों और कुछ थोड़े से दुखों
और बहुत सी उदासियों के बारे में मुख़्तसर में
कुछ टीपें मिलेंगी
लेखों-कविताओं के ढेरों कच्चे मसविदों के बीच ।

लेकिन तब, युगों बाद, कोई मेरा
बिगाड़ भी क्या पायेगा ?
और सबसे बड़ी बात तो यह कि
जिन्हें मिलेंगी भी ये डायरियाँ,
उनमें लिखी बातों का उनके लिए
न कोई मतलब होगा, न ही कोई अहमियत ।
हाँ, उनमें से अगर कोई कवि हुआ,
या कोई उदास प्रेमी,
तो बात और है ।


नौ 

एक अर्जित स्वप्न की कथा

कभी एक स्वप्न को मैंने
आमंत्रित किया था
दुखों के एक अकेले निर्जन द्वीप पर
पर मैं वहाँ खुद ही
नहीं पहुँच पाई समय पर ।
फिर कविता ने मुझे आमंत्रित किया
एक शाम साथ बिताने को
निर्वासितों की घाटी में ।
वहाँ तक पहुँचने के लिए
बनैले समय में मुझे
बर्बर गद्य की सड़कों से
होकर जाना था
और विचारहीन आलोचना की कई चुंगियों से
और कल्पनाहीन-सी कल्पनाओं और
अवास्तविक-सी वास्तविकताओं के
कई बाज़ारों से गुज़रना था ।
मैंने कविता तक पहुँचने के लिए
शक्तिशाली हमलावरों द्वारा
विस्थापित कर दिए गए लोगों
और पीछे धकेल दिए गए योद्धाओं से भरे
जंगल से गुज़रने की राह चुनी
एक छापामार की तरह ।
वहाँ मुझे
एक स्वप्न मिला
कठिनाई से अर्जित
यथार्थ की तरह ।



दस 

बड़े कवि

हमारे समय के बड़े कवियों ने
श्रम से साधा है
कला को कविता में,
अलौकिक रहस्यमय आभा दी है उसे,
अद्भुत हुनरमंदी से
तराशा है उसे
जनता के दुखों को
कलात्मक-चमकदार बनाते हुए
भाषा से जादू रच डाला है
इसतरह कि सत्ताधारियों को भी
कविताएं पसंद आने लगी हैं।
बहुत कुछ किया और पाया है
हमारे समय के बड़े कवियों ने,
बस खो दिया है
अपना ईमान।



एम एफ़ हुसेन 



ग्यारह 

पूँजी

कारखानों में खेतों में करती है श्रमशक्ति की चोरी
वह मिट्टी में ज़हर घोलती है
हवा से प्राणवायु सोखती है
ओजोन परत में छेद करती है
और अार्कटिक की बर्फीली टोपी को सिकोड़ती जाती है।
वह इंसान को अकेला करती है
माहौल में अवसाद भरती है
मण्‍डी के जच्‍चाघर में राष्‍ट्रवाद का उन्‍माद पैदा करती है
स्‍वर्ग के तलघर में नर्क का अँधेरा रचती है।
आत्‍मसंवर्धन के लिए वह पूरी पृथ्‍वी पर
कृत्‍या राक्षसी की भाँति भागती है
वह अनचीते पलों में
दिमाग पर चोट करती है
युद्धों की भट्ठी में मनुष्‍यता को झोंकती है।
वह कभी मादक चाहत तो कभी
आत्‍मघाती इच्‍छा की तरह दिमाग में बसती है
युद्ध के दिनों में हिरोशिमा
और शान्ति के दिनों में
भोपाल रचती है।



बारह 

एक कवि अगर गुम होना चाहे
तो जगहों की कमी नहीं।
गुम हो सकता है जैसलमेर-बाड़मेर के रेगिस्तानों के किसी सुदूर गाँव में,
या केरल या ओडिशा के समुद्र-तट की किसी बस्ती में,
सरगुजा और जगदलपुर के जंगलों में,
उत्तर-पूर्व के वर्षा-वनों में,

या हिमाचल या उत्तराखंड के पहाड़ों-घाटियों में कहीं I
पर सबसे अच्छा है गुम हो जाना
रहस्यमय, अँधेरे गर्भ में ज्वालामुखियों को छिपाए
उस जन-समुद्र में
जो हर कवि का मूल निवास होता है
और जिसे वह भूल चुका है।



तेरह 

कुछ ने

कुछ प्रेम किये एकतरफा,
कुछ को अधूरा छोड़ दिया,
कुछ से पीछे खींच लिये पैर
और उनके कुछ प्रेम बस
एक दीर्घ प्रतीक्षा बनकर रह गए I
फिर भी उन्होंने
प्रेम की बेहतरीन कविताएँ लिखीं,
इस दुनिया में
प्रेम की हिफाज़त और बहाली के लिए
शानदार लड़ाइयाँ लड़ीं
और ज़िन्दगी से छककर प्यार किया I
जिन्होंने ज़िन्दगी की
ज़रूरी लड़ाइयों से मुँह चुराया,
उनकी ओर पीठ कर दिया,
या उन्हें अधूरा छोड़ दिया,
वे प्रेम में पड़कर भी
कभी न कर सके प्रेम,
कभी न पा सके प्रेम,
अपरिचित रहे हमेशा
उस सौन्दर्यानुभूति से,
जिए एक भोगी प्रेत की तरह,
मरे एक भगोड़े सैनिक के अहसास के साथ
जिसपर गर्व नहीं था
किसी अपने को भी।



एम् एफ हुसेन 



चौदह 

प्यार वही, सिर्फ़ वही

कर सकता है
जो निर्भय हो I
प्यार वही कर सकता है
जिसका ह्रदय सघन संवेदनाओं से
भरा हो अपने लोगों के लिए I
फासिस्ट समय हमें
अकेला करता है I
अकेलापन हमें
भयग्रस्त करता है I
आतंक की ठंडी बारिश में
दिन-रात भीगते रहते हैं
हमारे ह्रदय,
अकड़ते और सिकुड़ते हुए
धीरे-धीरे अपनी सारी संवेदनाएँ
खो देते हैं I
सुन्दरता और कला और मनुष्यता
बस यही होती है कि
हम सुनते रहते हैं
एक प्रेतात्मा को खून सनी उँगलियों से
पियानो बजाते हुए
और उसके आदी होते रहते हैं I
इसतरह न जाने कब
हम खो देते हैं
प्यार करने की अपनी कूव्वत
और उदास पेड़ बन जाते हैं
सड़क किनारे खड़े
जिससे होकर हत्यारे रोज़ गुज़रते हैं I
पेड़ से मनुष्य बनने के लिए
होना पड़ेगा निर्भय
ढूँढ़ने होंगे संगी-साथी
और तनकर खडा होना होगा
फासिस्ट समय के ख़िलाफ़,
अपनी अपहृत संवेदनाओं को
फिर से पाने के लिए लड़ना होगा
एक कठिन युद्ध
और प्यार करने का दुर्लभ और कठिन हुनर
फिर से सीखना होगा I



पंद्रह 

मैंने भी प्यार की

कुछ जादुई कविताएँ
लिखनी चाही थीं कभी ,
पर जबसे होश सम्हाला ,
हत्याओं का मौसम था
जो कभी ख़त्म ही नहीं हुआ I
अब मैं चालू चलन से अलग हटकर
प्रतिरोध की कविताएँ लिखती हूँ
और बेहतर दिनों की प्रतीक्षा की
और कभी-कभी,
इनी-गिनी कविताएँ
वैसे प्यार की भी
जो युद्ध के दिनों में
और निराशा में डूबे लोगों के बीच
जीते हुए
किया जाता है I
००




परिचय :
सामाजिक-राजनीतिक कामों में पिछले डेढ़ दशक से भी अधिक समय से सक्रियता।
पिछले बारह वर्षों से कविताएं और निबंध लेखन
हिन्‍दी की विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं और लेख प्रकाशित
फिलहाल निवास देहरादून

1 टिप्पणी:

  1. जय मां हाटेशवरी...
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    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 20/03/2018 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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