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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
शिरोमणि महतो की कविताएँ




शिरोमणि महतो:
29 जुलाई 1973 को जन्म, शिक्षा एम.ए. (हिन्दी) प्रथम वर्ष
सम्प्रति : अघ्यापन एवं ‘‘महुआ‘‘ पत्रिका सम्पादन
प्रकाशन:  कथादेश, हंस, कादम्बिनी, पाखी, वागर्थ, परिकथा, तहलका, समकालीन भारतीय साहित्य, समावर्तन,द पब्लिक एजेन्डा, यथावत,सूत्र, सर्वनाम, जनपथ, युद्धरत आम आदमी, शब्दयोग, लमही, प्रसंग, नई धारा, पाठ,पांडुलिपि, अंतिम जन, कौषिकी, दैनिक जागरण ‘पुनर्नवा‘ विषेषांक, दैनिक हिन्दुस्तान, जनसत्ता विषेषांक, छपते-छपते विषेषांक, राँची एक्सप्रेस, प्रभात खबर एवं अन्य दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित ।


  उपेक्षिता (उपन्यास) 2000
  कभी अकेले नहीं (कविता संग्रह)2007
  संकेत-3 (कविताओं पर केन्द्रित पत्रिका)2009
  भात का भूगोल (कविता संग्रह)2012
  प्रकाशितहै  करमजला (उपन्यास) अप्रकाशित है।
  डॉ0 रामबली परवाना स्मृति सम्मान
  अबुआ कथा कविता पुरस्कार
  नागार्जुन स्मृति सम्मान
  सव्यसाची सम्मान(चयनित)


कविताएं

चाँद का कटोरा


बचपन में
भाइयों के साथ
मिलकर गाता था-
चॉद का गीत

उस गीत में
चंदा को मामा कहते
गुड के पुआ पकाते
अपने खाते थाली में
चंदा को परोसते कटोरे में
कटोरा जाता टूट
चंदा जाता रूठ ।

उन दिनों
मेरी एक आदत थी-
मैं अक्सर अपने आंगन में
एक कटोरा पानी लाकर
कटोरे के पानी में
-चॉद को देखता

बडा सुखद लगता -
कटोरे के पानी में
चॉद को देखना

मुझे पता हीं नही चला
कि चंदा कब मामा से
कटोरा में बदल गया......?

तब कटोरे के पानी में
चॉद को देखता था
अब चॉद के कटोरा में
पानी देखना चाहता हूँ ....!
००
सभी चित्र: अवधेश वाजपेई



















चापलूस

वे हर बात को ऐसे कहते जैसे -
लार के शहद से शब्द घुले हों
और उनकी बातों से टपकता मधु

चापलूस के चेंहरे पर चमकती है चपलता
जैसे समस्त सृष्टि की उर्जा उनमें हो
वे कहीं भी झुक जाते हैं ऐसे -
फलों से लदी डार हर हाल में झुकती है:
और कही भी विछ जाती है मखमल-सी उनकी आत्मा !

चपलूसों ने हर असंभव को संभव कर दिखया है
उनकी जिह्वा में होता है मंत्र -‘खुल जा सिम -सिम‘
और उनके लिए खुलने लगते हैं -हर दरवाजे
अंगारों से फूटने लगती है -बर्फ की शीतलता

चापलूस गढें हैं -नई भाषा नये शब्द
जरूरत के हिसाब से रचते हैं -वाक्जाल
जाल में फंसी हुई मछली भले ही छूट जाये
उनके जाल से डायनासोर भी नहीं निकल सकता

उनके बोलने में चलने में हँसने में रोने में
महीन कला की बारीकियाँ होती हैं
पतले-पतले रेशे से गँढता है - रस्सा
कि कोई बंधकर भी बंधा हुआ नहीं महसूसता

चापलूस बात-बात में रचते हैं -ऐसा तिलिस्म
कि बातों की हवा से फूलने लगता है गुब्बारा
फिर तो मुष्किल है डोर को पकडे रख पाना
और तमक कर खडे हो उठते है ं निति-नियंता

यदि इस धरती में चापलूस न होते
तो दुनिया में दम्भ का साम्राज्य न पसरता !
००


 हिजडे

न नर है न मादा बीच का आदमी
उसने जीवन में कभी नहीं जाना-
सहवास के अंतिम क्षणों का तनाव
न गर्भ -धारण के बाद की प्रसव -पीडा

अक्सर लोकल ट्रेन में वे मिल जाते
दोनों हथेलियों को पीटते -चौके छक्के लगाते
शायद इसीलिए लोग उन्हें कहते भी हैं -“छक्के”
लोगों को रिझाने के लिए उनसे पैसे निकलवाने को
अजीब-अजीब हरकतें करते -भाव भंगिमा दिखाते
कभी साडी उठा युवाओं को ढँकने लगते
तो कभी सलवार -समीज खोलने का ड्रामा
बांकी चितवन चमकाते -छाती के उभारो को मटकाते

कुछ लोग रिझते दस-बीस रूपये दे भी देते
कुछ खीझते और दो-चार गालियाँ भी देते
वे भी प्रत्युत्तर देना भली -भाँति जानते
खुष हुए तो ‘सारा-वारा-न्यौरा‘ कर देते
वरना मुॅह बिचका कर भाव-भंगिमाओं से मजाक उडाते

कौन जाने उनकी नियति ऐसी क्यों हुई
किसी देवता का श्राप या पूर्वजों का पाप
जिसका वे ज्यादातर समय करते परिहास
जो भी हो इसके लिए वे तो दोषी नहीं
शायद इसीलिए वे करते रहते हैं-मनुष्यता का उपहास !
००





















स्कूटी चलाती हुई पत्नी

स्कूटी चलाती हुई पत्नी
किसी मछली -सी लगती है
जो आगे बढ रही है-
समुन्दर को चीरती हुई
और मेरे अंदर
एक समुन्दर हिलोरने लगा है

स्कूटी चलाती हुई पत्नी
जब स्कूल जाती है
लोग उसे देखते हैं-
आँखे फाड-फाडकर
गाँव की औरते ताने कसती हैं-
‘मैडम, स्कूटी चलाती है,
भला कहॉ की ‘जैनी‘ स्कूटी चलाती है ?‘

स्कूटी चलाती हुई
मेरी पत्नी को देखकर
औरतों की छाती में सांप
मर्दो के ह्रदय मे हिचकौले....

स्कुटी चलाती हुई पत्नी
जब स्कुल जाती है
मेरी माँ बेचैन रहती है-
देखती रहती -उसका रास्ता
कि-कब लौटेगी वह
कहीं कुछ हो न जाये !

मेरी पत्नी ने बहुत मेहनत से
सीखा है-स्कुटी चलाना
उसने कभी साईकिल नही चलाई
उसके लिए स्कूटी चलाना कठिन था
और उससे भी ज्यादा कठिन था
अपने भीतर के डर को भगाना-
जो सदियो से पालथी मारे बैठा था !

अब तो
मेरी पत्नी के हौसले बुलंद हैं
माप लेने को-देस दुनिया
पंख उग आये-उसके पावों में

पत्नी स्कुटी चलाती है-
अपने मन की गति से
अब में उसके पीछे बैठकर
देख सकता हूँ-देस-दुनिया !
००

पिता की मूँछें


पिता के फोटो में
कडप-कडप मूंछे हैं
पिता की मूंछे
ऊपर की ओर उठी हुई हैं....

शुरू से ही पिता
कडप-कडप मूंछे रखते थे
 जिसकी नकल कई लोग किया करते थे

पिता बीमार पडते
उनका शरीर लत हो जाता
पीठ पेट की ओर झुक जाती
लेकिन उनकी मूंछे उपर की ओर उठी-हुई

उनकी मूंछो की नकल कर
लोग मुझे चिढाते
मैें खीज कर रोता
और सोचता-
पिता मूंछे कटवा क्यो नहीं देते ?


कभी-कभी देखता-
पिता मूंछों को सोटते हुए
उन्हे ऐंठते हुए
बडे निर्विकार-निर्लिप्त लगते

एक बार मेले में
पिता के साथियों की
कुछ लोगों से लडाई हुई
पिता लाठी ठोकते हुए
मूंछों पर ताव देने लगे
लडाई करने वाले
दुम दबाके खिसक गये
यह कहते हुए कि-बाप रे बाप
कडप-कडप मूंछ वाला मानुष !

फिर क्या -
पुरे इलाके में
पिता की मूंछो की धाक जम गई

पिता को मूंछो से
कभी कोई शिकायत नहीं रही
उन्होंने चालीस साल
मुंछो को सोटते हुए काटे....
दुखोः को चिढाते हुए....

पिता नौकरी से निवृत्त हुए
और गुमसुम-गुमसुम रहने लगे
दूर क्षितिज को ताकते
धंटो मूंछो को सहलाते-चुपचाप

और एक दिन
बिना कुछ बोले
पिता ने मूंछंे कटवा लीं.....

अब मैं रोज ढूँढता हूँ-
पिता के चेहरे पर-पिता की मूंछे !
००



















गुलगुलनी

ट्रेन की खिडकी से
लगकर बैठी थी-गुलगुलनी
उसके बाद हाथ भर सीट खाली थी
उससे हटकर लोग बैठे थे
कुछ खडे भी थे
उस खाली सीट पर
कोई बैठना नहीं चाहता था
गुलगुलनी से कोई सटना नहीं चाहता था

एक हाथ खाली सीट पाकर
वह बैठ गया झेंपता हुआ-सा
स्वंय को गुलगुलनी से सटने से बचाता-सा
उसके गंदे कपडे और शरीर की बास
मोटा-सा अहसास फूल रहे श्वास

धडाधड चलती टेन के हिचकौले
हवा के झोंको से पिघलता अहसास -
गरमी उमस व आलस से उंघता शरीर
बार-बार कंधे पर दुलकता माथा
गुलगुलनी के बदन का स्पर्ष व उष्णता
बदलने लगा उसके शरीर का ताप
भरने लगा मन में कोमल अहसास
और आत्मा में आदिम गंध !
००


गुलगुलनी की गोद में

उसका ढाई साल का बच्चा
जो अबतक देख रहा.था-‘मुलुक-मुलुक‘
पढ रहा था-चेहरे के रंगों को
अचानक दिया मूत-छर्र से....

धत्-धत्-धत्
सामने की सीट पर बैठे लोग
कपडे -झाडने लगे चेहरा पोंछने लगे
एक ने कहा-‘बडा बदमाश है-बच्चा‘
दुसरे ने कहा - ‘बच्चे ऐसे हीं होते ‘

गुलगुलनी ने बच्चे को डांटा-
बच्चा मुसक रहा था
सबको मन को कूट रहा था !
००

बंदरिया
अपने मालिक के इशारे पर
नाचती है बंदरिया
करती -उसके इशारों का अनुगमन
जैसे कोई स्त्री करती है -
अपने पुरुष के आदेशों का पालन ।

बंदरिया के गले में लगा सिकड
खींचता बंदरियावाला
हांथ में डंडा लिए उसे नचाता
उछल-उछल नाचती बंदरिया
जैसे वह समझती है -सब कुछ
अपने मालिक की बातों को इषारों को
डंडे की मार खाने से बचती:
और वह नाचती.....
जिसे उसने युगों से साधा है !

बंदरियावाला गाता-
‘‘असना पातेक दोसना
कोरइया पातेक दोना ।
दोने -दोने मोद पीये
हिले कानेक सोना ।।‘‘
बंदरिया मोद पीने का अभिनय करती
अपने कानों को पकडती
जैसे सचमुच उसके कानों में हो
-सोने की बाली ।

बंदरियावाले के डंडे के इशारे पर
वह नाचती रूठती रोने का स्वांग करती
जिसे देखकर -सभी खुश हो रहे -
बच्चे बूढे जवान और औरतें

औरतें तो ज्यादा खुश
वे खिलखिलाकर हँसती हैं-
देखकर अपने हीं-दुःख का स्वांग !
००

पानी

पानी खीरे में होता है
पानी तरबूजे में होता है
पानी आदमी के शरीर में होता है
धरती के तीन हिस्से में पानी ही तो है.....

हम पानी के लिए
अरबों -खरबों खरच रहे
धरती -आकाष एक कर रहे
हम तरस रहे-
अंतरिक्ष में बूंद भर पानी के लिए
शायद कहीं अटका हो -बूंद भर पानी
किसी ग्रह की कोख में
किसी नक्षत्र के नस में
या आकाष के कंठ में
पारे -सा चमक रहा हो-पानी !

पानी जरूरी है
चाँद पर घर बनाने के लिए
चाँद पर सब्जी उगाने के लिए
चाँद पर जीवन बसाने के लिए

जिस दिन मिलेगा-
बूंद भर पानी
मानो हमने पा लिया -
आकाष -मंथन से -अमृत !
००




















पुरुष बिनु नारी


(जिया बिनु देह नदिया बिनु बारी।
तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी ।।)

एक दिन एक बैरागी ने
तुलसी दास की
चौपाई की व्याख्या की-
इस प्रकार-
देह बिना जिया के
नदिया बिना पानी के
वैसे ही पुरुष बिना नारी के
अर्थात नारी के बिना पुरुष बेकार !

मुझे अचंभित कर गई
उस वैरागी की व्याख्या-
जिसने युगों से चली आ रही
व्याख्या को ही उलट डाला
और एक स्त्री के महत्व को बताया।

प्रसंग को छोडकर
छंद को देखने से-
पद का अर्थ सटीक बैठता
-नदी पानी के बिना
पुरुष नारी के बिना
बिल्कुल बेबस बेकार !

सामान्य पढा-लिखा बैरागी
और एैसी नवीन अपूर्व व्याख्या
जीवनानुभव का फलन हीं तो है:

अपना अनुभव भी यही कहता-
जो बैरागी कह रहा... !
००

इस जंगल में

पलाष के फूलां से
लहलाहाते इस जंगल में
महुए केे रस से सराबोर
इस जंगल में
कोई आकर देखे-
कैसे जीते है-जीवन
आदिमानव-आदिवासी !

जिनके लिए जीवन
केवल संधर्ष नही
संधर्ष के साज पर
संगीत का सरगम है
और कला का सौर्न्दय

उनके बच्चे खेलते कित-कित
गुल्ली डंडा दुबिया रस-रस
और चुनते लकडियाँ
तोडते पत्ते-दतुवन
जिसे बाजार में बेचकर
वे लाते-नमक प्याज और स्वाद

अब जब पूरा विश्व
एक ग्राम में बदल रहा है
इस जंगल की फिजाओ में
बारूद की गंध भर रही है

कोरइया के फूल खिलते
वन प्रांत इंजोर हो जाता है
चाँदनी उतर आती हे-प्रांतर में
सहसा भर जाता-धमाको का धुआँ
दम धुटने लगता-इस जंगल में

खिलते हुए पलाष के फूल-से
जंगल में आग लहक उठती है
महुए के फूल से चु रहा-
धायल पंडुक का रक्त

मांदर की थाप पर
थ्री नॉट थ्री की फायरिंग
सिहर उठता समुचा जंगल
खदबद करते पशु-पक्षी

कोयल की कूक, पंडुक की घू-घू चू
सुग्गे की रपु-रपु, पैरवे की गुटरगू
बंदर की खे-खे, सियारो का हुआँ-हुआँ
सात सुरो व स्वरो को घोट रही
छर्रो की सांय-सांय, गोलियो की धांय-धांय

शहर वाले कहते हैं-
ज्ंागल में मंगल होता है
फिर इस जंगल में क्यो
फूट रहा मंगल का प्रकोप !

इसके लिए दोषी है कौन
पूछ रहे  सखुए शीषम के पेड
सरकार है मौन-संसद भी मौन !
००


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पता : नावाडीह, बोकारो, झारखण्ड -829144
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सत्यनारायण पटेल
9826091605
bizooka2009@gmail.com

अस्मुरारी नंदन मिश्र की कविताएं



कविताएं

अपना-अपना लोक

दूब, अक्षत, गंध, पुष्प

उन्होंने सब को हवि किया

कि मिले मृत्यु बाद भी


दी बलि

बनाया देवालय

तोड़े नाते

लिया संन्यास

अपने जानते किये अच्छे-अच्छे काम

उन्हें जाना था परलोक

वे परलोक सुधार रहे थे।

मैंने उगायी दूब, बचाया अन्न

रखा पानी साफ

बीने काँटे, निकाला रास्ता,

किया प्रेम,बनाया घर

पशु-पक्षी सबसे मिलकर बसाया परिवार

मैं जानता हूँ

खत्म होने के बाद भी रह जाऊंगा

इन्हीं मिट्टी, हवा, आकाश में

मुझे भी अपना लोक संवारना है।
००




चित्र: अवधेश वाजपेई
पत्थर


यह बहुत बाद में जाना

कि एक खास किस्म का पत्थर

तैरते रहे पानी में

और साबित करते रहे तुम्हारा नाम

करवाते रहे मुनादी कि

डूबते को भी उबारना रहा तुम्हारा काम

लेकिन देखा किया ऐसा भी

पत्थर ऐसे भी थे

जो दूसरों को भी बनाते रहे पत्थर

तो गले में बंध गये डूबते वक्त

कुछ तो जोर लगा कर खुदवाते रहे छाती पर

तुम्हारा नाम

और गिरते रहे अविराम

डूबते रहे खुद भी

डुबाया औरों को भी

साथ ही तुम्हारा नाम

उबार लो

जो उबार सको

हे राम!  
००
चित्र: अवधेश वाजपेई


बिजूका महाराज


बड़े ही शान से खड़े किये गये हैं

बिजूका महाराज

हाँड़ी के माथे में कुछ नहीं है

बाहर कालिख और चूना है

आँखें खुली की खुली हैं

कान बंद के बंद

मुँह यूँ बाये हैं, जैसे लील ही लेंगे

फसल चुगने वाली चिड़ी-चुनमुन को

टेढ़े-मेढ़े शरीर पर फब रहा है

फटा-पुराना कपड़ा

और चुँकि वे बिजूका हैं

इसलिए उन्हें कोई शिकायत भी नहीं अपने कपड़ों से

अपने रंग-ढंग-स्थिति से कोई शिकायत नहीं उन्हें

उन्होंने कभी नहीं माँगा आईना

न कभी पूछा ही किसी से

कि मैं कैसा दिखता हूँ

अच्छा-बुरा...सच्चा-झूठा..

यूँ उन्हें चिड़ियों के खेत चुगने से भी कोई शिकायत नहीं

और न ही कोई शिकायत आवारा पशुओं से

यदि उन्हें लिखनी होती आत्मकथा

तो वे तटस्थता के मिसाल होते...

वैसे तटस्थता और उदासीनता में फर्क नहीं है

दोनों निष्क्रियता के पर्याय हैं

और इनके लिए सबसे अधिक यथार्थवादी और सटीक शब्द है कायरता

जो फर्क डाल देती रही है हमारे जीने में...

बिजूका महाराज शान से खड़े हैं

कि डर रही हैं चिड़ियाँ

कि आशंकित आवारे पशु

कि सुरक्षित है खेत

खेत की खड़ी फसल

मगर कब तक...


देखो! वह चिड़िया बैठ ही गयी है सिर पर

अपनी बीट से मुँह-नाक-आँख के अलावा भी कुछ बना दिया है

जिसका होना–न-होना बराबर है

ठीक आँख-कान-मुँह के होने-न-होने की तरह

वह कुत्ता अपनी आदत से बाज नहीं आया इन्हें देख कर

अब तो धोती खींच–खींच खेलना शुरु कर चुका


जरा देर में देखना बिजूका महाराज नंगे होंगे

कि होंगे ही नहीं

वे तो गिर गये लड़खड़ा कर

हाड़ी फूट गयी

बिल्कुल ही खाली थी

अब शायद सँभाल रख पाये

बरसात का कुछ पानी

चिड़ी-चुनमुन प्यास मिटाये इससे ही...
००



 युवा-परिदृश्य: एक बिंब


सामने कीचड़ है

कादो है

पानी है...

बीच में रखी एक ईंट पर एक पैर जमाए वह

देख रहा है दूसरे पैर के लिए उचित जगह

एक पैर पर लंगड़ी खड़ा यह युवा

पूरा एक समुचित बिम्ब है

वर्तमान युवा-परिदृश्य का...
००

संपर्क:

अस्मुरारी नंदन मिश्र

केंद्रीय विद्यालय दानापुर कैंट

पटना

9798718598

महिमा श्री की कविताएं


महिमा श्री: ने एम.सी.ए  , एम.जे
शिक्षा प्राप्त की है ।अतुकांत कविताएँ, ग़ज़ल, दोहें, कहानी, यात्रा- वृतांत, सामाजिक विषयों पर आलेख और समीक्षाएं लिखती रही है।
कविता संग्रह : अकुलाहटें मेरे मन की । साझा काव्य संकलन “त्रिसुन्गंधी” , “परों को खोलते हुए-१”, “ सारांश समय का” , “काव्य सुगंध -2”  में रचनाएँ  शामिल ।

विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में रचनाएँ  प्रकाशित। अंतर्जाल और गोष्ठीयों में साहित्य सक्रियता।

सम्प्रति :पब्लिक सेक्टर  में सात साल काम करने के बाद (मार्च २००७-अगस्त २०१४)
वर्तमान में स्वतंत्र लेखन, नई दिल्ली


कविताएं

1

बैठे-ठाले


तन्हाई चीखती है कहीं
पगलाई-सी हवा धमक पड़ती है ।
अंधेरे में भी दरवाजे तक पहुँच कर बेतहाशा कुंडियाँ खटखटाती है।
अकेला सोया पड़ा इंसान अपने ही भीतर हो रहे शोर से
घबड़ा कर उठ बैठता है ।
चौंक कर देखता है समय, अपने पास पड़े मोबाइल में
“रात के ढ़ाई ही तो अभी बजे हैं “
बुदबुदाता है अपने-आप से।
सन्नाटा उसकी दशा पर मुस्कुराता है।
उधर दुनिया के कहीं कोने में भीड़ भुख-प्यास से बेकाबू हो कर सड़को पर नहीं निकलती,
सामुहिक आत्महत्याएं कर रही होती हैं ।
मर्सिया गाने का काम स्वत: सोशल साईटो के तथाकथित बुद्धिजिवियों के पास है।
वहीं दूसरी ओर जेहादी तकरीर के बाद एक भीड़ हथियारों से लैस होकर निकल पड़ती हैं दुनिया को ठिकाने लगाने।
एक गरीब देश में भुकम्प आता है और खाड़ी देशों में  ताजा गुलाबी गोश्त की आमद तेज हो जाती है।
दिल्ली सत्ता के घंमड में चूर अपने विज्ञापनों में इठलाती है।
हाईकोर्ट अधिकारियों को याद दिलाता हैं उनके बच्चे को कहाँ पढ़ना चाहिए ।
नेता जी कहते हैं एक बार में एक ही व्यक्ति बलात्कार कर सकता है ।
देश के चौहदियों पर तैनात जवान रिटायमेंट के बाद
एक सेवा एक पेंशन की लड़ाई में कूद पड़ता है।
हम कई कप चाय पीने के बाद निष्कर्ष पर पहुँचते हैं
क्रांति होनी चाहिए !
और फिर टीवी खोल कर बैठ जाते हैं।
००


चित्र: अवधेश वाजपेई


2.

गुणा-भाग
---------
प्रेम का पर्यायवाची है
प्रतीक्षा
प्रतीक्षा का पर्यायवाची
धैर्य
धैर्य का पर्यायवाची
स्त्री
स्त्री का पर्यायवाची
धरती
धरती के अंदर दबे पड़े थे
दावानल
दावानल अब सुलग रहे हैं।
3.जद्दोजहद
बीती है जनवरी जैसे गुजरी हो सदी अपनी छाती में संभाले कई जन्मों का बल्गम
और एकाएक थूक दिया हो इतने पास
कि मक्खियों का हुजूम भिनभिनाता हुआ टूट पड़ा
नदी भी काले सैलाब से भर के मरनासन्न हो गई
कुछ भी सड़ने -गलने से पहले बचा लेने की जद्दोजहद जारी है

००



चित्र सुनीता

4.

फरवरी के नाम..
ओ वसंत! तुम्हारे स्वागत में सिर्फ प्रेम लिखना चाहती हूँ
तुम्हारी आहट से पहले और अंतिम पदचाप तक
सिर्फ प्रेम ...
अपने अन्तरराग को मधुर स्मृतियों में डूबों कर
अगले वसंतोत्सव के लिए भर लेना चाहती हूँ प्रेम का प्याला
ताकि लड़ संकू हर उस विष से जो अनजाने ही घर कर बैठा है रोम रोम में
अवांक्षित अवशिष्ट को परे कर
ओ वंसत ! तुम्हें जी भर जीना चाहती हूँ।

००


5.

और सर्द धरती गर्म हो गई
वो ठिठुरता हुआ उकडू हो कर
बैठने के प्रयास में सिकोड़े जा रहा था अपने हाथ पैरों  को
बीच बीच  में झाल -मुढी खरीदने आते ग्राहकों को
कंपकपाते हाथो से नमक तेल मिर्च डाल
उसे मिलाता फिर उन्हें देते हुए
ठंड से सूखे पड़े पपरीयुक्त होंठो से
सायास मुस्कुराने का करता प्रयास
मैं  देखती अक्सर उसे उधर से गुजरते हुये
अखबार बिछाये सर्द धरती की गोद में बैठा होता
मोटी फटी गंजी के साथ सियन उघड़ी  कमीज पहने
जो उसे कितनी गर्मी देती थी
भगवान ही जाने
और फिर एक दिन
रूमानियत से भरी गुलाबी ठण्ड को सहेजना चाहती अपनी यादों में
चल पड़ी बाजार को
जब मैं खरीद रही थी
मूंगफली , गजक और रेवड़ियाँ
औ कर रही थी मनचाहा मोल – भाव
तभी मैंने  कहते  सुना उसे
अपने एक फेरीवाले  संगी से
कल रात अलाव की चिन्गारी छिटकी
औ सारी बस्ती होम  हो गयी
सब राख हो गया
सर्द धरती तो गर्म हो गयी पर
अपना जीवन तो ठंडा हो गया
गर्म कपड़ो में सर से पाँव तक ढकी मैं
अचानक  कांपने लगी पर
वो और गर्म जोशी  से
जोर जोर से चिल्ला कर झालमुढ़ी  बेचने लगा
गुलाबी सर्दी जो अभी बड़ी ही रूमानी लग रही थी
कठोर और बेदर्द  लगने लगी ।

००



चित्र: विनीता कामले

6.

तुम स्त्री हो ....

सावधान रहो!
सतर्क रहो!
किस-किस से?
कब-कब?
कहाँ-कहाँ?
हमेशा रहो!
हरदम रहो!
जागते हुए भी
सोते हुए भी
क्या कहा ?
ख्वाब देखती हो ?
उड़ना चाहती हो ?

क़तर डालो पंखो को अभी के अभी
ओफ्फ! तुम मुस्कुराती हो
अरे! तुम तो खिलखिलाती भी हो ?
बंद करो आँखों में काजल भरना और
हिरणी सी कुलाचे भरना

यही तो दोष तुम्हारा  है।
शोक गीत गाओ!
भूल गयी?
तुम स्त्री हो !

किसी भी उम्र की हो क्या फर्क पड़ता है|
आदम की भूख उम्र नहीं देखती
ना ही  देखती है देश, धर्म औ जात
बस सूंघती है
मादा गंध
(निर्भया जैसी दुनिया की सभी लड़कियों व बच्चियों की याद में )
००

7.

तुम्हारा मौन ..
तुम्हारा मौन
विचलित कर देता है
मेरे मन को

सुनना चाहती हूँ तुम्हे
और मुखर हो जाती हैं
दीवारें , कुर्सियां
टेबल , चम्मचे,
दरवाजे ।

सभी तो कहने लगते हैं
सिवाए तुम्हारे...

००

8.

भीड़....
हां! भीड़ में शामिल
मैं भी तो हूँ।
रोज
अलस्सुबह उठ के
जाती हूँ।
शाम को आती हूँ।
दूर.... से देखती हूँ।
कहती हूँ।

ओह! देखो तो जरा
कितनी भीड़ है।

और फिर
मैं भी भीड़ हो जाती हूँ।

००


चित्र: सुनीता

9.

इस बार नहीं

एक दिन तुमने कहा था
मैं सुंदर हूँ।

मेरे गेसू काली घटाओं की तरह हैं।
मेरे दो नैन जैसे मद के प्याले।

चौंक कर शर्मायी
कुछ पल को घबरायी
फिर मुग्ध हो गयी अपने आप पर।
जल्द ही उबर गयी
तुम्हारे वागविलास से

फंसना नहीं है मुझे तुम्हारे जाल में
सदियों से सजती ,संवरती रही
तुम्हारे मीठे बोल पर

डूबती उतराती रही
पायल की छन छन में
झुमके , कंगन , नथुनी
बिंदी के चमचम में।

भुल गयी
प्रकृति के विराट सौन्दर्य को
वंचित हो गयी मानव जीवन के
उच्चतम सोपानो से

और
तुमने छक के पीया
जम के जीया
जीवन के आयामों को

पर इस बार नहीं
भरमाओ मत!
देवता बनने का स्वाँग
बंद करो।

साथ चलना है , चलो!
देहरी सिर्फ मेरे लिए
हरगिज नहीं.. ..

००

11.

कछुए सा खोल और चमकीली सीपियाँ

हम सब के पास एक खोल है।
बिल्कुल कछुए की तरह

जो खतरे को भांपते ही समेट लेता अपना अंग-प्रत्यंग ।

सच में पलायन का मतलब भागना होता है।
या नई संभावनाओं की तलाश में खुद को टटोलने के लिए
स्वंय का साथ।

विचारों का आना-जाना तो रोक पाते नहीं
पर बाहरी हलचल पर आँखे मुंद
विचारशील होने का ढ़ोग अवश्य करते हैं।

या खुद की पीठ थपथपा कर विचारों के सीपियों से
मोती ढ़ूढ़ लाने का गाहे-बगाहे दावा ठोकते फिरते हैं।

सच तो यह है कि समय सब देख रहा है।
हमारी कुंद होती बुद्धि के धार को
श्रेष्ठता के खोखले नाकाब को ।
नकली बाजार के हथकंडो के गुलाम ,
आरोप-प्रत्यारोप के कठपुतले हम ।
बात-बात पर हवा में मुठ्ठियाँ लहराने वाले।
नया ना कुछ खोजने, ना करने के काबिल
अपनी खोलो से निकलकर बस झूठे दावे करने का सलीका
जरुर हासिल कर लिया है हमने ।
००
12.

माथे की बिंदी
फुनगी पर ठिठका चाँद सा
या कह ले झील के पानी में ठहरा चाँद सा खूबसूरत लगता
माँ के माथे की बिंदी
उमस औ आलस्य से भरी गर्मियों की सुबह
रोटी बनाती हुई माँ उल्टे हाथ से जब अपना पसीना पोंछती
माथे से बिंदी गायब हो जाती
फिर अचानक ही उनकी बाँह में चिपकी दिखती
कभी गर्दन , पेट तो कभी पीठ पर
कई बार बाथरुम की दिवार पर
कभी ड्रेसिंग टेबल के शीशे पर
किसी मायावी से कम नहीं लगती थी बिंदी
जाने क्या था उन लाल-कथई बिंदियों में
रोक लेती रास्ता , ठहर जाती मेरी आँखे
लुका –छिपी का खेल चलता रहता
एक दिन बिंदी बदल गई बिंदू में
योग की पुस्तक में मिला एकाग्रता का नोट
किसी बिंदू पर लगातार देखने का अभ्यास
कई बार किया प्रयास
फिर भुल गई बिंदी और बिंदू का खेल
कि फिर दिखी है बिंदी
“पिकू” की दीपिका के भाल पर मध्यम काली बिंदी
तब से सलवार-कमीज में मेट्रो की आधुनिक बालाएं भी सजाये दिखने लगी हैं
माथे पर मध्यम काली बिंदी
जिन्हें टकटकी लगाके देखती रहती हैं कई आँखे
वे मुस्काती हैं साथ में दमक उठती है काली मध्यम बिंदी।

००

  • चित्र: अवधेश वाजपेई 

13.

निजत्व की खातिर
निजत्व की खातिर
कर्तव्यो की बलिवेदी से
कब तक भागेगा इन्सान?

ऋण कई हैं
कर्म कई हैं
इस मानव -जीवन के
धर्म कई हैं

अच्युत होकर इन सबसे
क्या कर सकेगा
कोई अनुसन्धान?

कई सपने हैं
कई इच्छाये हैं
पूरी होने की आशाये हैं
पर विषयों के उद्दाम वेग से
कब तक बच सकेगा इन्सान ?

भीड़-भाड़ है
भेड़-चाल है
दाव-पेंच के
झोल -झाल है

इनसे बच कर अकेला
कब तक चलेगा इन्सान?

कौन है ईश्वर?
जीवन क्या है?
मै कौन हूँ?
क्यूँ आया हूँ?
जिज्ञासायों के कई भंवर हैं।

डूब के इनमे
अपनों से कब तक?
मुख मोड़ सकेगा इन्सान...//
००



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नवनीत पाण्डॆ की कविताएं


नवनीत पाण्डे: 26 दिसंबर सादुलपुर (चुरु).शिक्षाः एम. ए.(हिन्दी), एम.कॉम.(व्यवसायिक प्रशासन), पत्रकारिता -जनसंचार में स्नातक। हिन्दी व राजस्थानी दोनो में पिछले पच्चीस बरसों से सृजन। प्रदेष- देष की सभी प्रतिनिधि पत्र- पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन।


प्रकाशनः हिन्दी- सच के आस-पास, छूटे हुए संदर्भ,  जैसे जिनके धनुष व सुनो मुक्तिबोध एवं अन्य कविताएं (कविता संग्रह) यह मैं ही हूं, हमें तो मालूम न था (लघु नाटक) प्रकाशित व राजस्थानी में- लुकमीचणी, लाडेसर (बाल कविताएं), माटीजूण, दूजो छैड़ो (उपन्यास), हेत रा रंग (कहानी संग्रह), 1084वें री मा - महाश्वेता देवी के चर्चित बांग्ला उपन्यास का राजस्थानी  अनुवाद।

पुरस्कार-सम्मानः लाडेसर (बाल कविताएं) को राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का ‘जवाहर लाल नेहरु पुरस्कार’ हिन्दी कविता संग्रह ‘सच के आस-पास’ को राजस्थान साहित्य अकादमी का ‘सुमनेश जोशी पुरस्कार’ लघु नाटक ‘यह मैं ही हूं’ जवाहर कला केंद्र से पुरस्कृत होने के अलावा ‘राव बीकाजी संस्थान-बीकानेर’ द्वारा प्रदत्त सालाना साहित्य सम्मान। संप्रतिः भारत संचार निगम लिमिटेड- बीकानेर कार्यालय में कार्यरत
**

कविताएं


मुक्तिबोध को करो याद!

कितने ही
कर लो प्रयास
जोड़ लो हाथ
हो जाओ
नत मस्तक!
दंडवत!
अगर उन्हें
होता मंजूर
वे नहीं ही लगवाते
खिड़की-दरवाज़े
और ताले
बन बैठते
जागीरदार!
रखते छुपा कर
चाभियां
अपनी अंटी में
हमारे लक्ष्य
पहुंचानेवाली
सीढियों की
अगर वाकई है हूंस
हासिल करने हैं
चित्र: अवधेश वाजपेई
अपने लक्ष्य
मत रखो उम्मीद
देंगे वे स्वयं
अपने हाथों
हमे चाभियां
निपटना ही होगा
इन चाभीदार
जागीरदारों से
छीननी ही होंगी
चाभियां
अगर न मिले सफलता
कोई वांदा नहीं
मत मरो यूं अकाल
अकेले चुपचाप!
अपनी अर्थी
निकलवाने से पहले
निकालो
उनकी भी अर्थियां
मुक्तिबोध को करो याद

तोड़ डालो
सारे गढ़- मठ
उठाओ खतरे
करो साहस!
हाथ में लो लट्ठ
आगे बढ़ो!
बढ़ो आगे!
लो लोहा!
उठाओ हथोड़े!
अगर नहीं खुलते, खोलते
तोड़ डालो ताले
खोलो! तोड़ो!
सभी बंद दरवाज़े
और खिड़कियां
यह आह्वान है!!
नाद है, अनहद नाद
नहीं इस में कहीं कोई
संशय, विवाद
हक है हमारा
काहे की
और क्यूं फरियाद....
***

किसकी आड़ ले आओगे तुम!

इस बार
किसकी आड़ ले
आओगे तुम!
इस बार
किसे हथियार
बनाओगे तुम!

जानता हूं
मेरा हर प्रश्न बेमानी है
तुम्हारे पास है
धर्म- जात का गौरव बचाने के ठेके
मनुष्यता, इंसानियत
तुम्हारे लिए
कोई मायने नहीं रखते
तुम्हारे पास
मेरे नाम की सुपारी है
तुम्हें तो किसी भी तरह
कहीं भी, किसी हाल
मेरी हत्या करनी है
करवानी है
तुम्हें आंवटित हुयी हैं
माचिसें
तुम्हें तो आग लगानी हैं

हमेशा की तरह
मैं लाचार,तैयार हूं
बताओ!
इस बार कहां
कैसे मारोगे तुम!
********

केवल इलाहाबाद की सड़कों पर ही नहीं

मैंने उसे
केवल इलाहाबाद की सड़कों पर ही नहीं
हर शहर
कस्बे,
गांव की गलियों
चौराहों पर देखा
वह
पत्थर तोड़ नहीं रही थी
पत्थरों से अपना सर फोड़ रही थी
बच्चा बिलख रहा था दूर पड़ा
उसके आंचल के दो बून्द दूध के लिए
वह वही
लीर- लीर आंचल
सूख चुकी छातियां
पत्थरों के ढेर के बीच
एक कामान्ध को सौंप रही थी
*******


चित्र: सुनीता

सच कहते हो!

तुम्हारे दिखाए दृश्य
बोले- लिखे शब्द नहीं

हमारे आंख, कान
समझ खराब है
*******







एक दुग्गी भी

कभी कभी
एक दुग्गी भी
सारे
इक्कों, बादशाहों
बेगम, गुलामो पर
भारी पड़ जाती है
सनद रहे!

तुमने लोहे को कहां सजते देखा है?

सिध्द करो
लोहा मिलावटी है
सजावटी है

क्योंकि सच यह है
लोहा अगर वाकई लोहा है
उसमें मिलावट नहीं हो सकती
उसकी सजावट नहीं हो सकती

मैंने तो हमेशा
लोहे को
गर्म होते
लाल होते
गलते- पिघलते
ढलते
लोहा लेते ही देखा है
हवा में बातें मत करो
झूठे इलज़ाम मत लगाओ...
मैं चुनौती देता हूं
आओ!
बताओ! और दिखाओ!
तुमने लोहे को कहां सजते देखा है?

हमारा लोहा

आप
जिन रत्न- स्वर्णाभूषणों से
सज संवर
इतराते, मदमाते
सिंहासनों महारथों बैठ
हमें गरियाते
जरा बताएं!
अगर नहीं होता
हमारा लोहा
कैसे ये शहंशाही रुतबा पाते

चिंगारियां कब धुंआ करती है

किसी घर से धुंआ नहीं निकल रहा
इसका मतलब यह नहीं कि
वहां कुछ जल नहीं रहा
चुपके-चुपके,धीमे-धीमे
सुलगा करती है
चिंगारियां कब धुंआ करती है


वाकई आदमी बनोगे...

तुमने लोहा सिर्फ देखा है
लोहा हुए नहीं कभी

जिस दिन भी
लोहे का एक भी कण
घुसेगा तुम्हारे भीतर
वह दिन ऎतिहासिक होगा
तुम्हें पता चलेगा
तुम्हारे होने का असल अर्थ
तुम लोहा होगे
लोहा लोगे
वाकई आदमी बनोगे...
*******



गांधी की सम्पत्ति शून्य

गांधी के साथवालों
गांधी टोपी वालों
गांधी संस्थान वालो
गांधी राग वालों
की सम्पत्तियों के आगे
बाप रे! इतने- इतने शून्य
वह डेढ़ पसली का मरियल बुढ्ढा
वाकई चतुर बनिया था
जो केवल एक शून्य से विराट रच गया
और विराट का भ्रम पालनेवाले मसीहाओं के गांठ
आज केवल शून्य बच गया
*******


चित्र: अवधेश वाजपेई



तुम्हारी चुप्पी


मुझे तुम्हारी चुप्पी पर
बिल्कुल आश्चर्य नहीं
न ही मुझे
रोकने, टोकने पर
मैं जानता हूं तुम ऎसे ही हो
जानते तो तुम भी हो
मैं ऎसा ही हूं
सही कहते हो-
राज, राजा के खिलाफ
मेरा हर कहा, मेरा अहित है
हो सकता है किसी दिन
जान पे ही बन आए
तुम्हारी चुप्पी
बेहतर
हर लिहाज़ से सुरक्षित है
नवरत्नी दर्ज़ा पाएं
दरबार जाएं, दरबार लगाएं
राजा के हर हुकुम पर
जो हुकुम! सिर नवाएं
हर अति, दमन, शोषण के विरुध्द
प्रतिरोध की आवाज़ दबाएं
सयंमित- सधे वक्तव्य दें
तानाशाही को लोकशाही,
बदहाली को खुशहाली सिध्द करें
राजा बहुत ही दूरदर्शी, काबिल है
भरोसा दिलाएं!
हर वक्त ताली बजाएं, बजवाएं!
*******

बेटी! तुम बेटी नहीं...

पहली बार महसूस कराया तुमने
मैं अकेली नहीं
तुम्हें यूं बोलते देख अचंभित
और गौरान्वित हूं
और दुखी भी
यह साहस
मैं  कभी क्यूं नहीं कर पायी
इतने बरस कहां थी तुम
ज़िंदगी में इतनी देर से क्यूं आयी
कैसे कह देती हो सब कुछ
साफ- साफ
कैसे चल देती हो बेधड़
कहीं भी
खड़ी हो जाती हो
किसी भी डर, ताकत के सामने
 तनकर

तुम्हारी नज़रें
झुकती नहीं
सीधे देखती है
आंखों में आंखे डाल
हर कलमस के खिलाफ
तुम्हारे हाथ जुड़ते नहीं
टूट पड़ते हैं
वहशी दरिंदों
गिध्दों पर
कहर बनकर

बेटी!
तुम बेटी नहीं
उम्मीद हो
हर मां की
नाउम्मीद ज़िंदगी में
कोख गौरान्वित है
तुम्हें जनकर
*******

चित्र: अवधेश वाजपेई


गाय पर लेख

बच्चे को पूरे दिन
क्लासरूम से बाहर
खड़े होने की सज़ा सुनायी गयी
उसके अभिभावकों को
स्कूल प्रशासन ने तलब किया
और चेतावनी दी
बच्चे पर नज़र रखें
बच्चे को खबरों
मीडीया से दूर रखें
उसे समझाएं
जिससे पाट्यक्रम में वर्णित
पाठों में लिखे सच से बाहर
कुछ भी, उसके दिमाग में न आए
देखिए तो उसने गाय पर लिखाए लेख में
क्या- क्या अनाप-शनाप लिख दिया है
स्कूल के बाहर बच्चों को
आए दिन सींग मारती रहती है
जहां जी चाहे रास्ते में शूशू-पोटी कर देती है
कभी भी स्वच्छ भारत वाला संदेश नहीं पढ़ती है
सबको अब शेर से नहीं, गाय से डर लगता है
गाय अब माता, पालतू जानवर नहीं
जंगली जानवर है
गाय अब दूध ही नहीं, मौत भी देती है
पहले अखलाख को मार दिया
अब पहलू की जान ले ली
गाय अब खतरा है, जिस किसी घर है
पढ़ा आपने...
सोचिए!
अगर किसी को भनक भी लग गयी
क्या हो सकता है
स्कूल के ताला लग सकता है
दंगा हो सकता है...
*******

सम्पर्कः

‘प्रतीक्षा’ 2- डी- 2, पटेल नगर, बीकानेर- 334003 मो.न. 9413265800 e-mail : navneetpandey.bik@gmail.com





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सत्यनारायण पटेल

तिथि दानी ढोबले की कविताएं


तिथि: तिथि (दानी) ढोबले। ने एम.ए. (अंग्रेज़ी साहित्य), बेचलर ऑफ जर्नलिज़्म, पी जी डिप्लोमा इन मास कम्युनिकेशन्स की शिक्षा प्राप्त की है और जन्म- जबलपुर (मध्य प्रदेश) में हुआ है।
तिथि

अब तक परिकथा, पाखी, शुक्रवार, अक्षरपर्व, वागर्थ, लमही, पूर्वग्रह, लोकस्वामी, सनद, संवदिया, नेशनल दुनिया, प्रबुद्ध भारती, दैनिक भास्कर, पीपुल्स समाचार, जनसंदेश टाइम्स, लोकस्वामी, जनसत्ता साहित्य विशेषांक , दुनिया इन दिनों - साहित्य वार्षिकी 2, समावर्तन का रेखांकित स्तंभ, देश की सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’, समय के साखी  आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, कहानी, लेख प्रकाशित। सिताबदियारा ,पहलीबार ब्लॉग पर भी कविताएं। दूरदर्शन और आकाशवाणी में रचनाओं का पाठ। राजस्थान पत्रिका में साक्षात्कार प्रकाशित।
भारतीय उच्चायोग(लंदन) द्वारा प्रथम काव्य संग्रह की पांडुलिपि पुरस्कृत तथा प्रकाशन हेतु अनुदान प्राप्त।
लंबे समय तक जबलपुर के अनेक महाविद्यालयों  में अध्यापन, आकाशवाणी में कंपियरिंग, `मनी मंत्र’, `बिंदिया’ पत्रिकाओं के बाद  पी7 न्यूज़ चैनल और फिर नई दुनिया में पत्रकारिता।
फिलहाल ऐकॉर होटल्स श्रृंखला की मर्क्यूरी जॉर्ज होटल में इंडियन शेफ के तौर पर कार्यरत है और स्वतंत्र लेखन जारी है।
 रेडिंग (य़ूके) में रहती है



तिथि दानी ढोबले की कविताएं


विनीता कामले


सफ़ेद पर्दे और गुलदान
                                                                     
परियों की कई पोशाकें दिखाई देती हैं दूर से
जिस पर रेत से लौटी लहरों ने की है कशीदाकारी
तेजी से पलटते हैं बचपन में सुनी परीकथाओं के पन्ने
नज़रों के सामने तैरते हैं सतरंगी बुलबुले
सूरज की किरणों पर सवार
निगाहें चली जाती हैं कांच की खिड़की के पार
जो ठहरती है वहां,
जहां सच में बदलती है फंतासी
झालरनुमा गोटेदार, सफ़ेद पर्दों के साथ

और भी नज़दीक जाने पर
दिखता है शान से बैठा हुआ गुलदान
जिसमें भरा है एक मिश्रण
प्रेम से उठायी गई मिट्टी और करुणा से लिया गया जल।
गुलदान में मुस्कुराते हैं गुल,
खुद पर पड़ती नज़रों से
बढ़ती है इनकी शोख़ी और गाढ़ा होता है रंग

यह दृश्य बेहतर कर देता है आंखों की रोशनी
नाक सूंघ लेती है अतीन्द्रिय गंध,
अचेतन से चेतन में प्रवेश करती है मुस्कान
फेफड़ों में भरती है ताज़ा प्रणवायु
दिमाग़ हो जाता है विचारशून्य,
नहीं रह जाता उसे याद
कोई जाति, वर्ग, धर्म, संप्रदाय और वर्ण
नहीं सोचता, कौन है इस संपत्ति का मालिक
उसी क्षण होती है प्रेम और आनंद की अलौकिक जुगलबंदी

इसी क्षण में शामिल होती है मुक्ति
होता है आंतरिक और बाह्य युद्ध स्थानापन्न
यही वो समय है, जिसके इंतज़ार में कटती है जिंदगी,
चलो, निकल पड़ें एक लंबी यात्रा पर
समूची धरती पर लगा दें
सफ़ेद झालरनुमा गोटेदार पर्दे
और हर कोण पर सजा दें गुलदान।
००


चित्र: सुनीता


प्रार्थनारत बत्तखें
                                                                                                                                               
नहीं है यहां विश्व के किन्हीं दंगाईयों, आतंकवादियों, उग्रवादियों
और ऐसे ही कई दुर्जनों का कोई गुट,
हवा में बहती है लैवेंडर की ख़ुशबू
बनाया गया है यहां जंगल के बीचों-बीच अस्पताल
जिसके आसपास रहती हैं दो बत्तखें ,
भागी भागी फिरती हैं ये
शायद इन पर लगा है मोरपंखी रंग चुरा कर
अपनी गर्दन पर स्कार्फ की तरह लपेट लेने का इल्ज़ाम,
क्वैक-क्वैक की अलहदा आवाज़ से
कुछ पलों के लिए रोक देती हैं
गुज़रते राहगीरों की ज़िंदगी में मची हलचल ।
तमाम मनोरंजन नहीं बहलाते
खिड़की से सटे बिस्तरों पर लेटे मरीज़ों को
वे दर्द से कराहना बंद कर देते हैं
जब ये बत्तखें नृत्य करती हैं,
मैं भी गुज़रती हूं रोज़ वहां से
सुबह और रात होने के ठीक पहले,
उनकी गतिविधियों को करती हूं कैमरे में कैद
ये देख मुस्कुराती हैं बत्तखें
और फोटो लेते वक़्त मेरे और क़रीब आ जाती हैं।
दिनभर वे जुटाती हैं अपना दाना-पानी
और करती रहती हैं एक दूसरे के साथ मनमानी,
पर जब शाम दरख़्तों के बीच से उनकी पीठ सहलाती है
वे घास के टीलों पर गर्दन पेट में छिपाए, पोटली बन जाती हैं।
यही उनका तरीका है विश्व के लिए प्रार्थनारत होने का,
इसलिए सो जाती हैं वे बाकी सबसे पहले
ताकि आने वाले सभी दिन हों रुपहले।
००


दो सहेलियां झूले पर

स्कूल से अभी-अभी लौट कर आयीं
लाल रंग के दहकते स्वेटर पहने
वे दो सहेलियां थीं
पुराने टायर का झूला दरख़्त पर बांधे
कुछ बेख़ुदी, कुछ होश में
वे झूल रही थीं आंखें मीचे
फिऱ आंखें खोल खिलखिलाते
बचपन से जवानी के झूले पर चढ़ने की तैयारी में,
वे बातें कर रही थीं
पृथ्वी से बाहर किसी ग्रह पर घर बनाने की ।
उनकी हंसी में समा गए थे पृथ्वी के प्राण,
आकाश झुक गया था उनके अभिवादन में,
चोटियों में बांध ली थी उन दो सहेलियों ने बारिश,
सांसों में खींच ली थी गुलाबों की ख़ुशबू,
टायर में भर ली थी उन्होंने अल सुबह की पाक साफ़ हवा,
अपने शरीर के चुंबकत्व से
खींच ली थी उन्होंने कण-कण की ऊर्जा।
वे उड़ने की जल्दी में थीं ये सब कुछ साथ ले कर,
इससे पहले कि पड़ जाएं किसी खतरे में उनके प्राण
छीन ली जाए उनसे,
उनके हिस्से की पाक़ साफ़ हवा,
फिर फेंफड़ों में भर दिया जाए भय का कार्बन।
कुरूक्षेत्र न बन जाएं उनके खेलने के मैदान ,
इस पृथ्वी पर रहते हुए न पड़ें
जवानी की दहलीज़ पर उनके कदम,
मोर की तरह नाचने से पहले
न कर ले कोई उनका शिकार।
पृथ्वी ने भांप ली है उन सहेलियों की योजना,
और,
डेफोडिल्स के कालीन बिछाकर
उन्हें कर दिया है इशारा
कि,
पृथ्वी अब भी उर्वर है, संभावनाओं से भरी है,
और नहीं चाहती है अपने प्राण गंवाना।

००

बर्फ की बारिश
                                                             
बंद कर दो टीवी और म्यूज़िक सिस्टम
खिड़ियों से मत झांको
निकलो बाहर
अपने उग्र और गर्म दिमाग़ों,
निस्तेज और सुस्त शरीरों से
अपनी लाचारियों और पशेमानियों से
अपने कृत्रिम और मायावी संसार से

सिर्फ़ घर के अंदर खड़े हुए मत मुस्कुराओ
बंद कर दो ये वीडियो रिकॉर्डिंग,
ख़ुशफ़हमी में मत आज़माओ फोटोग्राफी के नए-नए ऐप,

जऱा नीचे उतरो
आकर देखो
अपनी दृष्टि की प्यास दूर करो
महसूस करो इसे अपनी गहराइयों से
सर्वत्र पसरा ये उजाला मिटा देगा
तुम्हारे अंदर पसरा अंधेरा,
सांसों में भर लो ये ठंडक
ताकि तुम्हारा उबाल शांत हो,

अपने मन- मस्तिष्क पर ये सुंदर चित्रकारी होने दो,
देखो,
दैवीय बारिश नहीं होती रोज़
ये अलहदा और अपूर्व है
हर शय को गले लगाते
ये सिर्फ़ झक्क सफ़ेद बादल के
बिखरे हुए टुकड़े नहीं
स्वर्ग से गिरे हर्फ़ हैं
आओ, इन्हें इकट्ठा करें
और बना लें
अपने-अपने लिए भाषा के घर।

००

चित्र: अवधेश वाजपेई

मृत्यु से आत्मीय संवाद
                                             
मैं तुम्हारे लिए एक गर्भस्थ शिशु की तरह रही,
तुम मेरे लिए एक रहस्यों से भरा अचीन्हा विश्व
मेरे कानों पर गिरता रहा दुत्कार और चीत्कार का शोर
किसी ने तुम्हें अनबूझ पहेली बताया
किसी ने कोसा और जी भर कर दीं गालियां
अरे सुनो.... अभी मुंह फेर कर जाओ मत
इन बातों का रथ तुम्हारे पहियों पर ही चलता है
इसलिए, अपनी स्मृतियों की स्वेटर उधेड़ रही हूं
और अपनी स्मृतियां, तुम्हे सौग़ात में दे रही हूं
उस वक़्त कोई थपकियां दे कर सुला रहा था मुझे,
गर्म, मखमली, अदृश्य भारी कम्बल ओढ़ा रहा था मुझे
फिर अचानक...
मेरे धावक दिल ने पकड़ ली रफ़्तार,
कान सुनने लगे मधुमक्खियों का गुंजन
खोपड़ी हो गयी संतरे की दो फांक
अनुभूतियां बदलने लगीं करवट दर करवट
मेरा अंत मुझे क़रीब लगने ही लगा था
कि, तभी आया थिरकता हुआ रंगों का प्लाज़्मा
जो अभिज्ञ आकृतियों के जलीय बादलों में बदल गया
जिसके आर-पार दिखने लगीं सभी आकाशगंगाओं की चादरें
जिनमें समाते रहे रंगों की प्यालियों से छलकते- पिघलते रंग
मुझे लगा मैं एक रंग हूं उन्हीं के बीच का
इन बेहद ख़ूबसूरत लम्हों की मैं साक्षी थी
मैं फेंफड़ों का एक बड़ा गुब्बारा बनी बहुत ऊंची उड़ान पर थी
जिसने खींच ली थी अपने हिस्से की सारी प्राणवायु
और ग़ायब हो रहा था अभिज्ञता की दुनिया से
असंख्य तितलियां की अगुआई में गुरुत्वाकर्षण की सीमा को लांघना,
घास के हरे मैदानों के बीच बहती नदी के ऊपर से उड़ना,
फिर इस कायनात से अलग दुनिया के तारामयी आकाश में पहुंचना,
एक स्वर्गिक आनंद था।
जहां अकेलेपन का स्थानापन्न थी उमंगों की उत्साह भरी नीरवता
जो मेरे प्रफुल्लित अस्तित्व पर बेसाख़्ता दे रहीं थीं दस्तक
तभी मेरे मरहूम दोस्त ने मुझे लौट जाने को कहा और धक्का दे दिया
अब मैं अस्पताल के उसी बिस्तर पर हूं
जहां से शुरू हुई थी तुम तक पहुंचने की अविस्मरणीय यात्रा
अब फ़िजाओं में गूंज रही हैं मेरे लौटने की ख़ुशियां और मैं... सिर्फ़ एक शाश्वत दर्द हूं।

००


बचपन में लौटना
                                 
हां मैं मुकम्मल होना चाहती हूं
इसलिए क़ुदरत के फानूसों की नरमी को
छूने देती दूं अपनी त्वचा
दरख़्तों की सीढ़ियां चढ़ते हुए
मैं उनसे प्रेम करती हूं
वे सभी आवाज़ें सुनना चाहती हूं
जो बजती हैं फ़िज़ा के गिटार की तरह
मैं बातूनी होना चाहती हूं
मगर चिड़िया की तरह
हां, मैं एकता की आवाज़ बनना चाहती हूं
मगर झील में तैरती बत्तखों की आवाज़ की तरह

मैं हर भेदभाव ख़त्म करना चाहती हूं
मगर ज़र्रे-ज़र्रे तक पहुंचती मखमली हवा की तरह
मैं ख़ुशियों की प्याली में मुस्कुराहटें पीना चाहती हूं
मगर फूलों पर मंडराते भौंरे की तरह
हां मैं दुनिया की तमाम बुराइयां दूर करना चाहती हूं
इसलिए मैं अपने बचपन में लौटना चाहती हूं।

००


माँ के हाथ

ज़मीन पर बिछे गद्दे पर
लेट गई थी मैं शिथिल होकर
तभी मेरे सिर पर
फेरा था हाथ मेरी माँ ने
राहत में तब्दील हो गयी थी
उसी क्षण मेरी शिथिलता
नज़र आने लगे थे
मुझे कई इंद्रधनुष
अपनी माँ के उन हाथों में
जिसकी उँगलियाँ हो गयी थीं टेढ़ी-मेढ़ी
शायद पहले कभी
ग़ौर ना किया होगा
मैंने इस तरह।

पल भर में त्वरित गति से
मेरी स्मृति के पन्ने
पलटने लगे थे
पीछे की ओर
मुझे नज़र आने लगी थीं
माँ की वो ख़ूबसूरत उँगलियाँ
जो जलाई थीं उसने
कई दुनियादारों की फ़रमाइश में
और सबसे ज़्यादा
मुझे स्वाद की गर्माहट देने में

मैंने सीखा था
माँ की उँगलियों से
खुद जलकर
दूसरों के हृदय को
शीतल करने का नुस्ख़ा
झाँका था मैंने
माँ की जली-कटी
उँगलियों के घावों की गहराई में
जिसमें मुझे दिख रहे थे
कई लोगों के मुस्कुराते चेहरे

माँ कहती थी मुझसे
अपनी हथेलियाँ फैलाकर,
इन हाथों ने
ना जाने क्या-क्या किया
और आज देखो
क्या हो गयी इनकी हालत

माँ की बात
समझ नहीं आयी थी मुझे
मैं सोच रही थी कि
माँ ने पा लिया है
अपना वजूद
तितली, झरने, कोयल, जंगल, जानवर
आज सब हैं उसके साथ
माँ को कुछ
दे सकने की स्थिति में भी
चाहती थी मैं
कुछ माँगना उससे


क्या अपनी यंत्रवत सी ज़िंदगी में
मेरे हाथों में
कभी किसी को
दिखेगा मेरा वजूद

मैंने उससे कहा
वो दे मुझे हथियार
जो दे मुझे काम
उससे दूर रहने पर
दुनिया वालों से लड़ने में।
पर उसने मेरे हाथों में थमायी बाँसुरी
और कहा उसे बजाना सीखने के लिए।
००


चित्र: सुनीता


कुछ साँवले कुछ काले आदमी
                                                               
                                                                                                                           
कुछ साँवले से कुछ काले आदमी
मैंने देखे बारिश में डूबे उस खेत में
जहाँ पैदा हो गयीं थी मछलियाँ
कूदने लगे ये आदमी एक-एक करके
सुरक्षित कर लीं इन्होंने
अपनी-अपनी जगह

एक ख़ास बात और
इनके बारे में,
अजीब तरह की मुद्रा में
हवा में गोल-गोल घूमकर
कूदने से पहले याद दिलाते हैं ये
किसी सर्कस में दिखाए क़रतब की।

फिर बहुत जद्दोजहद के बाद
इनके हाथ आती है
इनकी ज़िंदगी की वजह
जिसे मुट्ठी में नहीं बाँध सकते ये
क्योंकि बहुत बड़ी हो चुकी है
वह मछली

चिकनी मिट्टी घोले हुए वह पानी,
निकलने नहीं देता
उस काले आदमी को आसानी से
कुछ विचलित होती है तैरने वाली उसकी मुद्रा,
और चिकनी मिट्टी
फिसला देती है वह मछली,
उस काले आदमी के हाथ से,
बिल्कुल उसी तरह जैसे तपते रेगिस्तान में
भटके हुए मुसाफ़िर के
मुँह तक आई पानी की कुछ बूँदें
फिसलकर आ जाती हैं
उसके गाल पर।

बेहद परेशान है वह काला आदमी
क्योंकि नदी-तालाबों में
बह रहा है ज़हरीला पानी
और डस रहा है मछलियों को।
उस काले आदमी को नहीं मालूम
जीवन जीने की कोई और विधा
इत्तिफ़ाकन
मैंने क़ैद कर लिया था ये नज़ारा
अपने अवचेतन में।

उस काले आदमी के अलावा
थे वहाँ कुछ साँवले आदमी भी
जिनके हाथ से नहीं फिसली थी कोई मछली
लंबे इंतज़ार के बाद आती सूरज की किरण
पड़ रही थी उनके चेहरों पर,
साफ़ दिख रही थी उनकी मुस्कुराहट।

लेकिन मैं,
कुछ और देख रही थी वहाँ
सुन रही थी रूदन की आवाज़
पलटकर देखा था मैंने
इस उम्मीद में,
कि, शायद यह आवाज़ है
उस काले आदमी की।
पर मैंने देखीं मछलियों की कई आत्माएँ
समूह में रोती हुई,
जिनकी आवाज़
मुझे लगी थी,
उस काले आदमी की आवाज़।
००

रात ट्राम और घड़ी
                                                                                                                             
रात ट्राम और घड़ी
तीनों हैं सहेलियां
तीनों बिल्कुल एक जैसी
तीनों चलती हैं लगातार
बोझ उठाए हुए
अनगिन अनसुनी चीखों और आंसुओं के बुरादे का
टूटे हुए सपनों और नादान दिलों की किरचों का
अलज़ाइमर, डिमेंशिया, सीज़ोफ्रेनिया में लिपटी लाशों का
क्रूरताओं हत्याओं के लिए हथियार बने
मासूमियत, मुलामियत लिए सुर्ख़ लाल चेहरों का।

एक जैसा है
तीनों का इंतज़ार भी .....
अपने-अपने वक़्त के बदलने का।

००

 रोटी जैसी गोलाई
                                                         
मैं शिद्दत से ढूंढ रही हूं रोटी के जैसी गोलाई
मुझे क्यों नहीं दिखती गोलाई
किसी पिज़्ज़ा, बर्गर या केक में
परकाल से खींचा गया गोला भी मुझे दिखता है कुछ कम गोल
स्कूल का ग्लोब, फुटबॉल, गोलगप्पे भी मुझे लगते हैं चपटे
शाही दावतों में भी रोटियों से गोलाई नदारद हैं
देसी होने का दावा करते ढाबों में भी नहीं मिलती
एक अदद रोटी अपनी आदर्श गोलाई में

इस तलाश में मैं, कहां-कहां नहीं गयी
थक कर मैं सो गयी
फिर अनजानी राहों पर निकल पड़ी
अगले पल मुझे लगा
मेरी त्वचा, नसों और हड्डियों का साथ छोड़ रही है
करोड़ों सूरज एक साथ जलते हुए
मेरी आंखों की रोशनी छीन कर अपना प्रकाश बढ़ा रहे हैं
वह उनकी दुनिया थी ,जहां वे मुझे ज़बरन खींच लाए थे
कह रहे थे देखो हमारी ओर
हमसे ज़्यादा गोल नहीं और कोई
मैंने नहीं मानी थी उनकी बात
उनके चंगुल से भागी तो पहुंची सितारों के घर
सभी सितारे एक स्वर में बोले
हम गोल भी हैं और ठंडे भी
अब तुम्हारी तलाश पूरी हुई
वहां कोई खतरा नहीं था
पर हवा बहुत बेचैन थी वहां
इसलिए मैं सितारों की बात से असहमत थी
फिर अगले कदम पर
अंधेरे ने समेट लिया मुझे अपने जंगल में
ज़ोरदार आघात से मेरी नींद खुली
नाक में घुस गई रसोई से आती रोटी की सम्मोहक गंध
तवे और चिमटे की झनझनाती आवाज़ से हुआ दिन का आगाज़
तमाम संभव संसारों में भटकने के बाद
अंतत: मुझे मिली घर की रोटी में एक निरहंकार और आत्मीय गोलाई।  
००


संपर्क:
यदि आप चाहते  हैं कि आपकी रचनाएं भी ' बिजूका ' पर साझा होनी चाहिए, तो प्लीज़ नीचे दिए जा रहे ई मेल bizooka2009@gmail.com, पर अपनी रचनाएं भेजिए । कहानी, कविता , ग़ज़ल और लेख किसी भी विधा की रचना भेज सकते हैं। आपकी रचनाओं का बिजूका पर स्वागत है। 

सत्यनारायण पटेल



कश्मीर में कत्लेआम : हिंदुस्तान को शर्म आनी चाहिए


आंद्रे वल्चेक
8 फरवरी 2015

पंजाबी अनुवादक :-बूटा सिंह

हिंदी अनुवादक :-अमोल आजाद
नोट :- हिंदी अनुवादक भी अपना कुछ समय कश्मीर में बीता चुके है  और इनमे से कुछ नजारे अपनी आँखों से देख चुके है |

कश्मीर स्वागत करता है| पहाडो के साथ लगे पहाड़, झील के किनारे लगे चीनार के उदास से पेड़, पर फिर भी सूरज के साथ-साथ सिर उठाये प्रतीत हो रहे है, एक रंग बिरंगी चित्रकारी की तरह लगते हुए|
                         
आपका स्वागत करती है कब्ज़ा करने वाली ताकते , हिन्दुसतान की सात लाख जबरदस्त सुरक्षा ताकतों की फ़ौज| कांटेदार तारे, फौजी दस्ते , और “सुरक्षा दस्तो का चलने वाला लगातार तलाशी अभियान | यहाँ की दहशत और वाहियात हरकतों को धरती पर कही और कल्पना भी नही की जा सकती|
स्वागत होता है,अमेरिका ,इसराइल और दुनिया की सभी फ़ौजी ताकतो  का जो यहाँ युध करना सीख रहे है| काश्मीर!  अभी भी खूबसूरत पर डरा हुआ, महानता से  लहू लुहान और बुरी तरह टूट चुका.........अभी भी डॅटा हुआ, टक्कर ले रहा है.......| कश्मीर !!!!!! फिर भी कम से कम दिल से आज़ाद है |
:::::::::::::::
चार बच्चे श्रीनगर में बड़ी मसजिद के नज़दीक खड़े है | तीखे, तेज तर्रार,और लड़ने के लिए तैयार, और जरूरत पड़ने पर भाग जाने ओर पीछे हटने को तैयार | यह सब नज़ारे तो आम सी बात है | " वो हमरी माताओ ओर बहनो के साथ ज़बरदस्ती कर रहे है”, एक लड़का चीक कर बोलता है| वो बच्चे  आँसू निकालने वाले गोले दिखाते है जो आम तौर पर भीड़ को भगाने के लिए ह्वा मे धमाका किया जाता है| पर कश्मीर में सीधा भीड़ पे चलाया जाता है जिससे उनके सिर लहू लुहान हो जाए या मारे जाए|
वहाँ पर कैमरे का प्रयोग किया जाता है ताकि बाद में पता लगाया जा सके की भीड़ में कौन शामिल है उसे पकड़ा जा सके और फिर गायब कर दिया जाए या उसे यातना घर में ले जा के उसे मरने की हालत तक पीटा जा सके| श्रीनगर के इस महोल्ले के लड़को को आम ही पकड़ लिया जाता है और उनमें से एक ना एक ने जरूर उस यातना को सहा होगा|
मैं उनके हाथो में पकड़ी हुई गोलियो की तस्वीरे ले रहा हू पर कैमरे को उनकी नज़रो से दूर रख कर , पर बच्चो को तो बिना डरके फोटो खिचवाने की चाह है|


ये एक मजाक ही है की आज इनडिपेंडेन्स का दिन है| और फिर वो बच्चे कहते है की "अब ह्म उस जगह पर जाएँगे उनसे दो दो हाथ करने, ह्मारे साथ चलना"
वो अरबी शब्द बोलते है, अपनी उंगलिया आसमान की तरफ़ कर के| चहरे पर मुस्कान ला कर, वों बहादुर  और शहीद होने के लिए हमेशा त्यार रहने का दिखावा करते है| पर  मै जानता हूँ की उनके अंदर एक डर की भावना छुपि हुई है|
वो अच्छे बच्चे है मासूम ओर संकटग्रस्त|
में उनके साथ वायदा करता हूँ  की में वापिस लौट के आयुंगा..........
कुछ दिन बाद मैं नयी दिल्ली अपने पुराने दोस्त के घर उसके साथ कश्मीर पर चर्चा करता हूँ  |
हम दोनो  सहमत है की कुल मिला कर ,पूर्व ओर पश्चिम या दक्षीण के लोगो को वाहा की दशा के बारे में कुछ ज़्यादा नही पता| हिन्दुस्तान और वाहाँ की मीडीया इस अत्याचार को ,इस ज़ुल्म को दबाने का काम कर रही है|
वजह यह है की ब्रिक्स देशो के साथ धोखा करके हिन्दुस्तानी फ़ौज संधियों की बात करते है दूसरी तरफ व्यापारिक वर्ग खुली व्यपारक मंडियों की बात करके पश्चिम देशो के काफी नजदीक जा रहे है | अब भारत एक खास रुतबे के उपर घमंड कर सकता है, इंडोनेशिया की तरह |
श्री मान काक (मेरे दोस्त डेल्ही से) यह भी बताते है आज कल दुखो की आलसी मंडी में मुकाबला बहुत ज्यादा सख्त हो गया है |
मेरे द्वारा कश्मीर में हिंदुस्तान की फौजी मुहीम, और इसके साथ हिंदुस्तान की पुलिस और कश्मीर में लगाये फौजी अफसरों को युद्ध तकनीक सिखाने के लिए अमेरिका और इसराइल के शामिल होने की बात का जिकर करने पर काक कहते है :-
 जहां तक दहशत का सवाल है, भारत की फ़ौज अमेरिका और इसराइल  को बहुत कुछ सिखा सकता है | सयोंगवश काक की दोस्त लेखिका अरुन्ध्नती रॉय  ने मार्च 2013 में “डेमोक्रेसी”  के उपर चर्चा करते हुए खुलासा किया था: ” आज कश्मीर दुनिया की सबसे ज्यादा फौजी तैनात वाला शेत्र है| हिंदुस्तानी  फ़ौज ने यहाँ सात लाख से उपर सुरक्षा ताकते लगा दी गयी है और 1990 तक लोगो का संघर्ष  हथियारबंद हो गया , तब से अब तक सत्तर हजार लोग मारे जा चुके है , एक लाख से ऊपर लोगो को शारीरिक और मानसिक यातनाये दी गयी, आठ हजार से उपर तक लोगो को लापता कर दिया गया| मेरे कहने का भाव , हम चिल्ली या फिलिस्तीन की तो बहुत चर्चा करते है , पर यहाँ पर मरने या टार्चर होने वाले लोगो की तादाद ज्यादा है, जिसकी चर्चा करते हुए भी हम घबरा जाते है”|
:::::::::
खुद कश्मीर में मैं “ जम्मू एंड कश्मीर कुलिशीन ऑफ़ सिविल सोसाइटी” के साथ मिलके काम कर रहा हू- इस संस्था के मुखिया परवेज इमरोज और ह्यूमन राईट के विचारक परवेज माटा के साथ मिलके | दोनों मेरे अछे दोस्त बन चुके है |
दरअसल जे.के.सी.सी.एस. का मानना है की 1990 से ले कर अभी तक सत्तर हजार लोग मारे जा चुके है ज्यादातर आम लोगो की | जो कुछ कश्मीर में हो रहा है उसे ये संस्था सरेआम नस्लीय हत्याकांड करार दे रही है | श्रीमान परवेज इमरोज ने इस लेख के लिए लिखा है:-
“1989 से ही फ़ौज जंग की तरह आम लोगो पर जुल्म करती आ रही है क्यूंकि फ़ौज को कानून की खुली छुटी दी है और शायद ही किसे फौजी को कोई हत्याकांड के लिये कभी सजा मिली हो| जम्मू कश्मीर का फौजिकरण ने हर पहलु पर असर डाला है , मीडिया और सियासी समाज भी इस कत्लेयाम को रास्ता दिखा रहा है जिस के बारे में इनका ख्याल है की फ़ौज सरहिद के दुसरे पार के देहाशात्गार्दो से लड़ रही है | हिंदुस्तान की मीडिया लापता हुए लोगो की गिनती , कब्रों की गिनती , मारे गये लोगो की गिनती, यातनाए सेंटर में कैद किये लोगो की गिनती को नजरंदाज करती आ रही है|”

जम्मू कश्मीर की आज़ादी के संघर्ष को कुचलने के लिए, हिंदुस्तान सरकार एक प्लान के साथ दमन चक्कर चलाये हुए है हथियार बंद संघर्ष को कुचलने के लिए और अवाम की आवाज को दबाने के लिए हिंन्दुस्तान सरकार ने सात लाख से उपर फौजियों की तैनाती की हुई है| ये वो अवाम  है जो अपना निर्णय खुद लेना चाहती है की वो कहा रहना चाहते है जिसका वायदा हिंद्स्तान सरकार ने 1948 और 1949 के बीच संयुक्त राष्ट्र में किया था | हिंदुस्तान सरकार की तरफ से किया जा रहा जुल्म एक नियति का हिस्सा है |
कश्मीर में, मै जहाँ भी गया ,जहां भी सफ़र किया, हर तरफ कब्जे की लगातार और जबरदस्त निशानिया नजर आ रही थी, तकरीबन हर जगह ही फ़ौज, पुलिस और नीम फौजी ताकतों की अजीब मौजुदगी से लेकर अंतहीन कब्रों तक | हर बड़ी सड़क के साथ साथ फ़ौज की बैरक की लम्बी लम्बी कतार थी | सभी बड़ी और छोटी सड़क पर फौजियों के ट्रक आवाज करते हुए दौड़ रहे थे| जगह जगह नाके और तलाशी केंदर बने हुए थे |
बिलकुल सीधी और वहशी ताकत ही कश्मीर में खून खराबा और तबाही नही कर रही| परवेज माटा खुलासा करता है की ये बेदर्द हिन्दुस्तानी ताकते लोगो के बीच घुसबैठ करने में कामयाबी प्राप्त कर चुके है | जासूस और मुखबिर लोगो में अपनी पेठ बना रहे है | विरोध करने वालो को आंतकवादी करार दे दिया गया है | इस तरह संगर्षशील संगठनों को तोडा जा रहा है, इसी प्रकार लोगो के आपसी भाईचारे को भी बिखेर दिया गया है और ये ही हाल वहाँ के स्थानीय परिवारों का कर दिया गया है|
कश्मीर में शारीरिक और मानसिक यातनाये देने का ढंग आपकी कल्पना से भी बहार है| मैंने पुरे विशव  के युद्ध शेत्रो की पता नही कितनी बार जाँच पड़ताल की है और हर बार बार दहशत से रोंकटे खड़े हो जाते है | पर कश्मीर में जो मुझे पता चला उस चीज ने मेरे भयानक डर को भी मात दे दी है |
आधुनिक इतिहास में ,कश्मीर में हिंदुस्तानी फौजी ताकतों की बेरहमी का मुकाबला सिर्फ 1965 में इंडोनेशिया में ढाए जुल्म या पूर्वी तिमोर में इसके द्वारा  की  गयी जन हत्या, इसी तरह पपुया में जनसंहार या कांगो में या युगांडा की दहिशत ताकतों से किया जा सकता है |
ये बहुत हैरान कर देने वाला व्यंग्य है की इंडोनेशिया और हिंदुस्तान दोनों पश्चिम देशो के ग्राहक है जो उनसे व्यापारिक सामान खरीदते है, दोनों को ही लोकतान्त्रिक ओर सहनशील शब्दों से नवाजा जाता है|
:::::::
“हिंदुस्तान अँधा ,धोंस ज़माने वाला दरिंदा है “, श्रीनगर शहर के बाहर के इलाके के पेवेज इमरोज के घर मुझे बताया जाता है| पूरी तरह से रीती रिवाज के मुताबिक बहुत सारे लोग फेह्रिन (एक तरह की पोशाक) के नीचे पुराने जमाने की गर्मी देने वाली कानग्डिया को अपनी छाती के साथ लगा के बेठे है| हम सब चाय पी रहे है| जहा तक इस बैठक का सवाल है, मैंने सिर्फ इस लेख में लिखे जे.के.सी.सी.एस. के दो सदस्यों के नाम ही जनता हू | बाकि के सदस्य अपनी पहचान छिपा कर काम कर रहे है अपने और संगठन की बचाव के लिए | उन सब लोगो ने मुझसे बात करके , हालातो को बयाँ करके और मेरे साथ संपर्क एवं जानकारिया दे कर मेरी बहुत मदद की | वो सभी लोग अपनी पहचान को छिपाने की शर्त पर मुझसे बात करने के चाहवान लग रहे थे, और ये भी दिख रहा था की कैसे वो अपने काम की तरफ वफादार थे |



 जब भी हम फिलिस्तीन के बारे में बात करते है तो हिंदुस्तान बहुत ही भावुक परतीत होता है ,हालाँकि प्रधान मंत्री द्वारा हिंदुस्तान को पश्चिम देशो के नजदीक ले जाने के कारन इस वयवहार में भी तब्दीली आ रही है | अमेरिका और इसराइल दोनों यहां युद्ध तकनीके सीख रहे है आम जनता के उपर हमले करके बड़ा हास्यात्मक और भावनात्मक अभ्यास है| बेशुमार फौजी और पुलिस ऑफिसर अमरीका ,यूरोप और इसराइल में युद्ध तकनीक को सिख रहे है|पुलिस अधिकारी हवाई यात्रा करके दुसरे देशो में ट्रेनिंग प्राप्त कर रहे है| हिन्दुस्तानी फ़ौज, अमेरिकी एवं इस्राइली ताकतों के साथ मिल के युद्ध तकनीक पर काम कर रहे है विशेष तौर पर पाकिस्तान के साथ लगे इलाके लद्दाख में|
“दरअसल लद्दाख इसराली लोगो में बहुत प्यारा है और हर साल २०-३० हजार सैलानी एस इलाके में आते है “|
“इस इलाके में में इस्राइली तोर तरीको को कुछ हद तक अपना लिया गया है , यहा उनकी सोच और नस्ली बेद भाव की नीति को अपनाया जा रहा है |
इस्राइली ताकतो की  नीतिया किसी से छुपी नही है: ये पूरी तरह से सरेआम है| इसराइल की फिलिस्तीन अवाम के खिलाफ हर लड़ाई लिखित में रिकॉर्ड होती है| और लड़ाई का एक ही उदेश्य है अपनी ताकत दिखाना जैसे शेरो के झुण्ड हिरनों के उपर हमला करते है| विदेशो में और खुद इसराइल के लोग इस करवाई की हमेशा से निंदा करते आ रहे है| विशव के अलग अलग देशो के ग्रुप यहाँ तक की पूर्वी यूरोपों यूनियन भी फलिस्तिन की आजादी की मांग कर रहे हैं, कश्मीर का मामला बिलकुल ही अलग तरह का है: हिंदुस्तान के लोगो को कश्मीर के हालातो से बिलकुल ही अलग तरह की तस्वीर पेश की जा रही है| यहाँ के लगभग 80,000 लोगो को पहले ही मार दिया गया है | लाखो के हिसाब से लोगो को यातनाये दी गयी है | पर इन हालातो पर दुसरे मुल्को के साथ साथ हिंदुस्तान के लोगो ने भी चुप्पी साधी हुई है|”
कश्मीर और फिलिस्तीन में चल रहे संघर्ष में काफी समानताए है| नई डेल्ही से मेरे मित्र संजय काके के द्वारा बनाई गयी मशहूर फिल्मो में से एक का नाम है “ जश्न-ऐ-आज़ादी- हम अपनी आज़ादी का जश्न कैसे मनाते है”,ओर ये फिल्म बिलकुल ही विषय के मुताबिक है|
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कुपवाड़ा (कश्मीर का एक गाँव) पहाड़ी के उपर काफी ज्यादा कब्रे नजर आ रही है| जब तक हम वहाँ पहुंचते है तब तक वो इलाका बंद हो चुका होता है| आज हिंदुस्तान द्वारा किये कत्लेआम की २१वी बरसी है | दो दशक से ज्यादा समय हो गया जब कश्मीरी अवाम ने हिंदुस्तानी कब्ज़ा ख़तम करने की आवाज को उठाया था तो सत्ताईस लोगो को बेहरहमी के साथ कतल कर दिया गया था |
“यहाँ काफी सारे लोगो को पकड़ कर लापता कर दिया गया था , या उनको नकली लड़ाई में मार दिया गया था| और ये काफी समय तक चलता रहा , परवेज माटा इस बात का खुलासा करता है | उन दिनों बहुत साडी लाशे हस्पतालो में आती रहती थी जो काफी कटी फटी हालत में होती थी,उनमे से कुछ लाशो की टाँगे नही होती थी  या कुछ की बाजुए कटी होती थी इससे सरल तरीके से अंदाजा  लगाया जा सकता था की इन्हे मारने से पहले टार्चर किया गया था |”
वहाँ एक पेड़ के साथ जंग लगे बॉडी स्ट्रेचेर रखे हुए थे, मुझे बताया गया की ये सारे स्ट्रेचेर लाशो को इन कब्रिस्तानो में लाने के लिए इस्तेमाल होते थे | सुरक्षा ताकते जंगलो से भर भर के लाशे ला कर यहाँ छोड़ जाते थे | इस पूरी पहाड़ी को कब्रिस्तान में बदल दिया गया है वहाँ मुझे एक स्कूल भी दिखाया गया जो की उन कब्रों से घिरा हुआ था जो की पहाड़ी की चोटी पर बना हुआ है | सुरक्षा ताकते सारी लाशो को विदेशी बिना पहचान वाली करार देती है | “वहाँ पर काफी सालो से रहने वाले बिना पहचान वाली लाशे” एक मजाक सा प्रतीत होता है | और ऐसी सात हजार से भी उपर लोगो की कब्रे है|
“एक और अचंबित करने वाला तथ्य की सात लाख की सेना सिर्फ दो या तीन सौ मुजाहिदीन जो सरगरम है उनसे इतने लम्बे समय से निपटने की जंग लड़ रही है|”
पर असल में ये लड़ाई दूर दराज या ऊँची पहाड़ी पर रहने वाले लोगो से निपटने के लिए है जो इन सेनाओ का चारा बनते है | फिर उनकी लाशो को मुजाहिदीन करार दे दिया जाता है, इसके फलस्वरूप जबाज फ़ौज को हिंदुस्तान से सम्मान और अच्छा खासा बजट मिल जाता है साथ ही साथ सेना में रैंक भी बढ़ जाता है|
“लड़ाई” में किसी को भी यातना देना शामिल है, चाहे किसी आदमी पर मुजाहिदीन होने का शक हो या उसका कोई संबंद्ध हो या कोई उनकी बात भी करे|
कुपवाड़ा में यातना देने में किसी भी आदमी जिसके उपर शक है , उसकी टाँगे या हाथो की उंगलिया काट दी जाती है| पाकिस्तान के साथ लगते इस इलाके में बहुत ही घिन्न तरीको से और बहुत ही भयानक यंत्रो से यातनाये दी जाती है | लोगो की छाती को गरम लोहे से दागा जाता है और उनके गुप्तांग पे करंट छोड़ दिया जाता है, पैरों के तलो का मांस फाड़ दिया जाता है | छत से उल्टा लटका कर गुदा में शराब की बोतल घुसा दी जाती है| टांगो को नकारा बनाने के लिए लकड़ी के बड़े बड़े लट्ठे काफी घंटो तक टांगो के उपर रख दिए जाते है| आदमियों के पेरो में कीलें ठोकी जाती है| और जिन लोगो ने अपने शारीर पैर अध चाँद छपवाया होता है उन निशानों को पिंघले लोहे से दाग कर मिटाया जाता है |
अगर कोई औरत इस पेंच में फंस जाती है तो निसन्धे उसके साथ मिल कर बलात्कार किया जाता है |


निश्चित ही ये सब एक स्व: कार्य नही है , साफ़ तौर पर ये सब पहले से ही तय होता है सुरक्षा ताकते जो भी यहाँ कुछ कर रही है ये सब चीजे इन्हे पहले से सिखाई जाती है| वहाँ के राज तंतर ने एक नये तरह का गिरोह खड़ा कर दिया गया है | इसे एस.ओ.जी. (स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप) कहा जाता है, ये मुख्या तौर पर उन लोगो को मिला कर बनाया गया है जिन लोगो के रिश्तेदार किसी मुठबेड़ में मुजाहिदीनो द्वारा मारे गये है| ये लोग जिस तरह के ढंग अपनाते है की उसकी कल्पना करना भी भयानक है| “जो लोग गायब हो जाते है या जिन बेकसूर लोगो को यातनाये दी जाती है उनकी कोई रिपोर्ट दर्ज नही करने दी जाती, इसी कारण हिंदुस्तान की जनता को इन सच्चाई से दूर कर दिया जाता है, पर अकेली मेरी रिपोर्ट ने ही पाँच हज़ार लोगो को दि गयी यातनाओ की सच्चाई को आगे ला दिया है , मिसाल के तौर पर एक बाप का सिर खौफ से भरे परिवार के सामने कलम कर दिया गया”, परवेज इस बात का खुलासा करते है |
में परवेज को कुछ समय के लिए रोक देता हू , जो कुछ मुझे बताया गया में उसे बर्दाश्त करने के लिए कुछ समय चाहता था |
हम और आगे, पाकिस्तान की सरहिद की तरफ जा रहे है | ये सचमुच एक हरी भरी जगह है- हरियाली और अनछुई खूबसूरती | बरफ से ढक्के बड़े बड़े पहाड़, अनछुई नदिया और गुफाये| मैंने ड्राईवर को कहा की मुझे कुछ ताजी हवा की जरुरत है | मैंने जिस जगह जाना है वहाँ जाने के लिए मुझे कुछ डर लग रहा है परन्तु जाना भी जरूरी है , वहाँ जाने से पहले थोडा यहाँ रुक कर हिम्मत जुटाना चाहता हूँ
हम दो गाँवो की तरफ जा रहे है: कुनन और पैश्पुरा |
यहाँ तेईस फ़रवरी उन्नीस सो इकानवे में कुनन को सेना द्वारा घेरा डाल लिया गया, और तेरह साल से उपर के मर्दों को गिरफ्तार कर लिया गया| वो लोग अपने साथ यातना देने वाले यंत्र साथ लेकर आये  थे और जो यातनाये उन्हें दी गयी वो बड़ी भयानक थी|
हम गाडी इक तरफ लगा देते है और फिर मुझे एक घर में ले जाया जाता है
ये एक बहुत ही साफ़ सुथरा सा घर है| हमने अपनी चप्पले और जुत्ते उतार लिए | बैठक में दो आदमी पहले ही दिवार का सहारा ले कर और नरम सिरहाने ले कर बैठे थे| एक तीसरा आदमी थोड़ी देर बाद बाहर से आता है|
हम वैसे यहाँ यातनाओ के उपर बात करने नही आये जबकि जबर जुल्म के उपर हमे बताया जायेगा |
पर वो लोग अपनी आप बीती बताना शुरू कर देते है , उनमे से एक बात को आगे बढाता है |
ये एक फरवरी का महीना था और काफी रात हो चुकी थी, भर काफी कड़ाके की ठण्ड थी| ये सब कुछ रात को ग्यारह बजे शुरू हुआ और सुबह चार बजे तक चलता रहा | सारे मर्दों को कड़ाके की ठण्ड में बाहर निकाल लिया गया और हम सब के कपड़े उतार कर ठंडी हवा में खड़ा कर दिया गया | चारो तरफ चार चार फुट बरफ गिरी हुई थी| हममे लगभग सैंकड़ो लोगो को यातनाये दी गयी उस बर्फीली ठंडी हवा में और चालीस से पचास आदमियों को तो बहुत ही बुरे तरीके की यातनाये दी| उन्होंने हमे करंट लगाया और ठन्डे पानी में लाल मिर्चे घोल कर हमारे सिर को डुबोया गया |
कमरे में कोई औरत नही है ना ही घर के आस पास कोई औरत नजर आयेगी |
एक और बजुर्ग ने बताना शुरू करना शुरू किया और मैंने अपनी आंखे उसकी तरफ कर ली| ये सब कुछ बहुत ही बैचेन करने वाला था और मुझे पता है की पच्चीस साल बाद ये सब कुछ याद करना बहुत ही मुश्किल काम था|
घर में औरतो और बच्चियों को ही छोड़ा गया था , वो अकेली और बेसहारा थी  बाद में दो सौ के करीब फौजी उन घरो में घुस गये मतलब हर घर में पाँच से दस, उन सब के पास शराब की बोतलें थी| वो सब शराब में टल्ली थे | औरोतो के साथ जबर जुल्म किये गये | उन सभी औरतो के साथ........और सिर्फ औरतो के साथ ही नही , छह से लेकर तेरह साल की लडकियों के साथ भी......उन सबके कपड़े फाड़ दिए गये फिर उनके साथ बलात्कार किया गया |
फौजी औरतो पर चिल्ला रहे थे “ हरामजदियो तुम उन सब बागियों के साथ मिली हुई हो ना?”
यह सब हिन्दुस्तानी फौजियों के द्वारा किया गया था और हिन्दुस्तान में सिर्फ आम बात है जिसे आसानी से ब्यान नहीं किया जा सकता | उनके गुप्त अंगो में धारधार चीजे या लोहे की सलाखों को गुसा देना और बहुत कुछ......
वो लोग अपनी  बात को आगे जारी रखते है “ हमारी  बहुत सारी औरते लहू लुहान थी| उनमे से कुछ तो चार से पांच दिन तक बेहोश रही थी “ ये मुझे उन तीन लोगो ने बताया जिन की पत्निया उस भयानक रात से गुजरी थी |



“उनमे से एक औरत को तीन दिन पहले ही बच्चा हुआ था , बच्चा अपनी माँ से चिपका हुआ था जब उस रात को फौजी उस घर में घुस्से थे, पहले उन्होंने उस बच्चे को दिवार के साथ पटक दिया फिर उस  औरत के साथ सामूहिक बलात्कार किया......”|
“इसके इलावा उन्होंने उस रात एक नाबालिक लडकी के साथ भी वो ही किया और उसकी दोनों टांगे  तोड़ दी और कुछ दिन बाद वो लडकी मर गयी ....”|
“कुछ औरतो को काफी साल तक इलाज करवाना पड़ा क्यूंकि  उनके गुप्तांग बुरी तरह से घायल कर  दिए गये थे “
“उस रात कुल मिला कर पाँच औरते मारी गयी...’
उस गाँव के दो पुलिस वाले थे , जिन्होंने उन औरतो की सहायता करने का प्रयास किया था और वो गवाही देने के लिए भी आगे आये थे परन्तु बाद में उनमे से एक को पकड़ कर गोली से उड़ा दिया गया  है|
मुझे बताया गया की चालीस औरते आगे आई और उन्होंने गवाही दी| ये सब शादी शुदा औरते थी | पर कोई कार्यवाही न हुई | हैरानीजनक ढंग से कनुन की  कोई भी लडकी  से अब शादी नही  करना चाहता क्यूंकि कलंक ही इतना बड़ा लगा दिया गया है
परवेज ने खुलासा किया किया की “अभी भी इसी जबर जुल्म को जंग के हथियार की तरह प्रयोग में लाया जाता है, जहा पे अवाम इस फौजियों से घिरी हुई है”|
“कुनन गाँव में इस प्रकार के जुल्म दहाने  के लिए एक भी फौजी को कभी भी कोई सजा नही हुई”
हमारे वहाँ से चलने से पहले उन जुल्मो की शिकार हुई औरत के एक पति ने खुलासा किया
“ये शुरुआत की बात है ............उसके बाद बहुत सारे खौफनाक वाकये हुए| हमने हिन्दुस्तानी कानून प्रबंध काम काज और रहन सेहन शुरू किया था| पर एक चौथाई सदी के बाद भी हमारे हालात वही है वो ही जुल्मो के शिकार होते है | यहाँ पर कानून सिर्फ कसूरवार को बचाने के लिए बनाये गये है | कश्मीर के फौजीकरण ने हमरी जिंदगियो को बर्बाद कर दिया है |अब तो हम लोग तक़दीर के शेयर है जो हमें इस नरक से मुक्ति दिलवा दे | हमारे लिए जो भी हुआ एक खौफनाक सदमा था | यहाँ तक की हमें दुसरो गावों के लोग हमें ताने मारते है “ ओए ! तुम सब लोग उस इलाके से हो ना जहाँ कि सारी औरतो के साथ बलात्कार किया गया था “|
ये एक मजबूत कश्मीरियों के साथ एक छोटा सा अनुभव था जिन्होंने मेरे आगे अपना दिल खोल देने का मन बना लिया था |
जब उनकी बातचीत का दौर ख़तम हुआ तो तब हम कनुन से पोश्पुरा की तरफ चल पड़े | लोग मेरे साथ पूरी तरह से घुल मिल गये थे और उन्होंने मुझे अपनी तस्वीरे लेने के लिए इज्जात दे दि थी |
मुझे वह सवीकार कर लिया गया था |
जब हमने अपनी गाड़ी को श्रीनगर की तरफ मोड़ लिया था तो रस्ते में गाड़ी में काफी देर तक चुप्पी छाई हुई थी फिर मेंने चुप्पी को तोड़ते हुए कहा
“परवेज???”
“हाँ”
ये बात की वो अब भी औरतो का मजाक उड़ाते है .....मैंने बात शुरू की “
मुझे पता था की परवेज भी इसी बात के बारे में सोच रहा था |
“उसने मुझसे पुछा की क्या आप उस लडकी से शादी करना चाहोगे जिसके साथ ये सब हुआ “|
“अगर मैं उस लडकी से प्यार करता हु तो जरुर करूंगा में एक स्वर में कहा “
“यहाँ कार हमारा सभियाचार फेल हो गया है” परवेज ने कहा| उस समय मुझे एहसास हुआ की वो भी वही करेगा जो मैंने उससे कहा |
मैंने उसे पुरबी तीमोर के एर्मेरा शहर जनतक अत्याचारों के बारे में बताया| ये सब इंडोनेशिया की फ़ौज ने किया था वह का मंजर बिलकुल कश्मीर के कनु गाँव जैसा था |
उस समय में पूर्वी तीमोर में गेर क़ानूनी काम कर रहा था| मुझे गिरफ्तार कर लिया गया एयर काफी दिन तक टार्चर रूम में टार्चर किया गया| वहाँ पर मौजूद जितने भी अत्याचारी थी आज वो सभी इंडोनेशिया में राज कर रहे हैं |
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जब हम कुपवाड़ा षेत्र को पार गये तो कार का माहोल बदल गया |
परवेज ने कहा की “ में तुम्हे बताना नही चाहता था , पर यह सम्भावना बहुत थी कि हमे रोक लिया जाता और हमारी तलाशी ली जाती या पूछ-गिज की जाती या टार्चर सेंटर ले जाया जा सकता था ...........”
मैं समझ गया |
पर अब सब कुछ ठीक-ठाक था|
हम जितनी दूर कुपवाड़ा से जा रहे थे उतना ही महफूज महसूस कर रहे थे, अब तक हमने अपने सफ़र को सही ठहराने के लिए काफी सारी दलीले दे चुके थे| मैंने कार से ही कुछ फौजियों की तस्वीरे खिंच ली थी | फिर मैंने ड्राईवर को कार रोकने के लिए कहा मुझे यूरिन के लिए जाना था | उसने कश्मीर के बहुत खूबसूरत सेब के बाग़ के आगे ब्रेक लगाये | मैं कार से उतरा और पहले पेड़ की तरफ चल पड़ा , ताज़ी हवा और खुबसूरत गाँव और बहुत कुछ.......| फिर मैंने एक फौजी को खड़ा देखा जो की कुछ मीटर दूर एक बंकर में छुपा हुआ था, अपनी मशीनगन के साथ, हर समय तैयार |
मैंने उसके तरफ मुंह करके यूरिन करना शुरू कर दिया | फिर मैंने उसका मजाक उड़ाते हुए उसे सलूट मारा | उस फौजी के मुह पर कोई मुस्कराहट नही थी वो तो दबंग की तरह उस सेब के पेड़ के नीचे खड़ा रहा | में उस नजारे को देख के सोच रहा था की कश्मीर के अन्दर सेब के पेड़ ज्यादा है या फौजी ??


मैं टक्कर लेने वालो लडाको के लिए मशहूर शहर सोपोर में श्रीमान हसन भट्ट के घर गया |
श्री भट्ट उनमे से एक लडाका था, पर उसको ग्रिफ्तार कर लिया गया और बहुत बार उसे यातना सेंटर में ले जाया गया और वहां कई दिनों तक उसके साथ मार-पीट की और करंट लगाया गया, फिर वो टूट गया और उसने उस सरगर्मी वाले अभियान को अलविदा कह दिया|
सुरक्षा ताकतों ने उसके दोनों जवान बेटो को मार दिया था| दोनों बेटो को बिलकुल पंद्रह सालो की उमर में मार दिया गया था| उसका एक बेटा दो हजार छह में दूध की दूकान पर दूध लेने गया था , उसी समय एक फौजी ने चलती गाड़ी से उसकी छाती पर गोली मार दी और वो वही पर ढेर हो गया | दूसरा बेटा 2010 में उस समय मारा गया , जब कुछ लडाके पथराव कर रहे थे , और वो भी पत्थर  मार के घर की तरफ भाग रहा था फौजी  उसका पीछा कर रहे थे तो उसने दरिया में छलांग लगा दी | पुलिस ने पानी में जिसे भी देखा उसके उपर अश्रु गैस के गोले दागने शुरू कर दिए, उनमे से एक उस लडके के सीधा सिर पर जा लगा और वो वही पे मारा गया |
“ में उन दोषियों को  जानता हु , मैं  जानता हूँ की वो ठाणे का इन्चारज कौन था जिसने वो गोले दागे थे”, श्री मान भट्ट कहता है (जिसके दोनों बेटो को मार गिराया गया  था )| मैंने उस के खिलाफ केस दर्ज करवाने की बहुत कोशिशे की  पर हर मुझे जलील करके भगा दिया गया |
“वो इन्चारज अफसर अब यु.एन ओ. शांति सेना में शामिल होने जा रहा है” परवेज ये सब बताता है | “ हिन्दुस्ता अक्सर उन् लोगो को यु.एन.ओ. में भेज देता है जो लोग कश्मीर में लड़ते है | ये चीज एस देश के लिए अच्छा पैसा कमाने का तरीके है ............ पर मेरी जत्थेबंदी ने उस के खिलाफ सारे साबुत इकठे करके यु.एन.ओ. को भेज दिए पर कुछ टाइम बाद हमारी अर्जी को सिरे से नकार दिया गया  और हमे चेतावनी भी दी गयी की भविष्य में हम किसी पे ऐसा इल्जाम न लगा सके, परवेज ने बात खत्म की |
दरअसल मैंने हिन्दुस्तानी यु.एन. “ शांति सेना “ को कांगो लोकतंतर गणराज्य में गोमा के अंदर करवाई करते हुए देखा था , जहा यु. एन.एच.सी.आर.(शरनार्थियो के लिए यु.एन. हाई कमीशन) के मुखी ने मेरे आगे हिंदुस्तान की “शांति सुरक्षा दस्ते “ द्वारा की गयी गैर क़ानूनी हरकतों के बारे में मुझे गुप्त रूप से बताया था |
उसके बाद में और श्रीमान भट्ट जेहलम नदी के किनारे जा कर खड़े हो गये|
“ये बड़ी दूर पाकिस्तान तक जाता है” भट्ट साहब ने मुझे इतला किया |
जिस भयानक समय से भट्ट साहब गुजरे है उसके बावजूद भी वो बहुत ही दयालु , और बहुत ही सज्जन किस्म के इंसान है|
मैंने उस साजन पुरुष से पुछा की क्या वो सोचता है की कश्मीर आज़ादी हासिल कर लेगा??
“अस्सी% कश्मीरी अवाम आज़ादी चाहती है”, वो कहता है| मैंने भी सोचा अस्सी % बहुत बड़ी संख्या होती है या नही ??
मुझे वो जगह दिखाई जा रही है जहाँ उन्नीस सो तरान्न्वे में बी.एस.ऍफ़.(बॉर्डर सिक्यूरिटी फार्स) की तरफ से सोपोर शहर का पूरा इलाका  तबाह कर दिया गया  था उस समय 53 लोगो को मार दिया गया  था|
उसके बाद हम एक घर में जाते जाते है,जहा कुछ दिन पहले हिंदुस्तान सुरक्षा ताकतों और मुजाहिदीनो के बीच में एक जबरदस्त टकराव हुआ  था |
सोपोर शहर आज भी बड़ी ताकत से लड़ रहा है  , पर वह एक भय भी है | ठण्ड है, और भय भी है |
वहाँ कुछ लोगो ने मुझे बताया की अब सोपोरे और उस जैसे इलाको में विरोध करना एक डरावना सपना है|  क्यूंकि लोगो को गायब कर देना उस इलाके में एक आम सी बात है|
मुझे ये भी बताया गया  की इस इलाके में लड़ने वाले युवाओ को दूर करने के लिए और भटकाने के लिए सुक्ष ताकते उन्हें नशे की तरफ धकेल रही है |
पर कुछ और लोग कहते है की सोपोर के लड़के अपनी लड़ाई लड़ने में एक द्रिड संकल्प से काम कर रहे है|और वो सब वह पर सरगरम है | ये शहर बहुत बहादुर लडके पैदा करता है, वो लोग जो झुकते नही है वो लडके जो डरते नही है| इसीलिए ह्न्दुसतानी ताकते इस इलाके को मिनी पकिस्तान कहते है अब इन लडको के लिए सवाल ये उठ रहा की इस खतरनाक फ़ौज के साथ लड़ना इतना आसान है या नही अगर आसान है तो कैसे ?
ये तब तक हो सकता है , यह तक की सोपोर में , यहाँ तक की आधी रात को, एक उस घर के सामने जहाँ अभी कुछ दिन पहले  लड़ाई हुई थी, वहाँ पर हर कोई हकीकत को जानता है ; “सिर्फ लोगो का गठजोड़ मदद कर सकता है “|
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एक समय तक तो कोई भी इन गैर कानूनी हत्याएं, लापता कर देना, यातनाये और बलात्कार के बारे में लिखे लेख और रिपोर्ट को पढ़ कर बोर हो जाता है , और दिमाग भी तक़रीबन सुन हो जाता है|
एक समय पर मुझे एक ऐसे आदमी से मिलवाया गया और सबूतों को दिखाया गया जिसको सुरक्षा  ताकतों ने पकड़ लिया था और बुरी तरीके से यातनाये दी गयी थी और जब उन्हें लगा की वो बागी है तो उसकी दोनों टांगो को काट दिया गया | पर उस हिम्मत वाले आदमी ने इसे भी सहन कर लिया | बाद में उस आदमी को काफी दिन तक जेल में रखा और जब वो वहाँ पर रह रहा था तो सुरक्षा ताकतों ने उसके शरीर का मांस काट काट कर उसे दिया और उसे खाने पर मजबूर किया गया | और उस चमत्कारी आदमी ने इसे भी सहन कर लिया......मामले को कोर्ट में भेजा गया पर किसी को भी सजा नही दी गयी|
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यहाँ जन कतेलाम हो रहा है, भयानक , कहर भरी धरती , और हिन्दुस्तान या पश्चिम देशो की भुजदिल  मीडिया ओर बुद्धिजीवी इन अत्याचारों की चर्चा नही करते |
अगर कोई कश्मीर के इन हालातो की चर्चा करता है या कोशिश करता है तो उसे देश द्रोही करार दे दिया जाता है , धमकाया जाता है, मारा जाता है |
अरुंधती रॉय (एक समाज सेविका , बुद्धिजीवी , लेखिका और बुकर प्राइज विजेता ) को बार बार देश द्रोही कहा जा रहा है , उन्हें पता नही कितनी बार उनके खिलाफ मुकदमा चलाने या उमर कैद दिए जाने की धमकिया दी जाती गयी है|
सब के प्यारे रेडियो होस्ट डेविड बरसामिया ( अल्टरनेटिव रेडियो अमेरिकन बानी ) को हिन्दुस्तान से बिना कारण दिये निकाल दिया गया |
अक्टूबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील प्रशांत भूषण के द्वारा कश्मीर के हालातो पर टिप्पणी करने पर सुप्रीम कोर्ट के अन्दर उनके ही  चैम्बर में जब वो बेठे थे तो हमला किया गया और बुरी तरह से पीटा गया।

 कश्मीर में सिर्फ हिन्दुस्तानी सैलानी ही नही विदेशी सैलानी भी आते जाते रहते है| वो लोग सिर्फ गुलमर्ग के बर्फीले इलाके में चहलकदमी करने या स्नो बोर्डिंग करने आते है या लद्दाख के इलाके में पैदल यात्रा करने आते है | यह पर ज्यादातर इस्राइली या अमेरिकी सैलानी आते है  |
बहुत सारे स्थानीय लोग इसे “ ब्लात्कार्स्तान का भयानक सैर सपाटा “ कहते है |
गुलमर्ग के पहाड़ो में मुझे कई जोड़े मिले | मैंने बर्फ के उपर चहल कदमी करते हुए बरतानवी  जोड़े , और छुट्टिया काटने आये जर्मन जोड़े से बात शुरू की कि क्या तुम लोग कश्मीर के इन ब्यानक हालातो के बारे में जानते हो  उनका एक सपशट और साफ़ सा जवाब था की “नही “| फिर मैंने उन्हे पुछा की क्या अपने फुअजी ट्रक , बंकर , हथियार नही देखे जिन्होंने पुरे कश्मीर को बर्फ की तरह ढक्का हुआ है ????
उनका जवाब था की कश्मीर के लोग आंतकवादियो का साथ देते है तो लाजमी उनसे निपटने के लिए ये सब जायज है या नही है ???
अमेरिका राज्य अपने पड़ोसी देशो में अपने तरीके से वहाँ पर दहशत फ़ैलाने का काम और वहाँ के लोगो के उपर अमानवीय अत्याचार करने का काम कर रही  है जिसके पुख्ता दस्तावेज उपलब्ध हैं| ये सब पड़ोसी मुल्क है :- अफ्रीका में रवांडा , यूगांडा और कीनिया , लैटिन अमेरिका में हन्द्रूस और कोलंबिया, मध्य यूरोप में इसराइल, सऊदी अरब और क़तर, इंडोनेशिया, थाईलैंड और अब दक्षिण एशिया में हिन्दुस्तान |
यु.एन.ओ. इन सभी देशो को मुस्कराहट बेखरने वाले देश या अहिंसावादी देश की उपाधि दे कर इन्हे सन्मानित करती है| ये पूरी तरह हास्यपदक सा महसूस होता है, पर कहीं न कहीं बहुत से लोग इन शब्दों को ही सच्चाई मान लेते हैं |
वजह यह है की बहुत से लोगो को इन सब चीजो के बारे में पता ही नही है| वजह ये भी है की पधार्थ्वाद का हो जाना या आपकी इंसानियत का मर जाना |
और ये सब बंद हो जाना चाहिए | इंसानियत के खिलाफ इन जुल्मो को नंगा करना होगा | हजारो बेकसूर लोगो को मारने वाले इन मुल्को को शर्मिंदा करवाना पड़ेगा |
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जैसे मैंने इकरार किया था की २६ जनवरी को में श्री नगर में उसी बड़ी मस्जिद पर लोट आया | में कुछ लडको के पीछे चलता रहा | कुछ गलियां आगे जा कर , तक़रीबन दोपहर के दो बजे लडिया शुरू हो गयी उन लडको  के झुण्ड और फौजियों के बीच |
ये एक अनाडी लड़ाई थी पर बहुत ही ज्यादा सख्त , और साफ़ तोर पर फिलिस्तीन की लड़ाई जैसी |
यहाँ पर एक ही बड़ा अंतर था की मुझे छोडके वहाँ के सथानीय लडको के होंसले, के अलावा यहाँ पर दूसरा और कोई नही था जो सुरक्षा ताकतों के खिलाफ गवाह बन सके |
इससे दो दिन बाद मैं एशिया की सबसे लम्बी केबल कार में सवार हो गया है| में देखना चाहता हूँ की “उस पहाड़ी के उपर क्या था “| निश्चित ही वहाँ पर एक फौजी अड्डा है|
 नीचे उतारते वक्त, बिजली गुल हो गयी और हमारा आसमानी शिकारा  हवा में ही बंद हो गया| शिकारे का दरवाजा बंद नही होता था  और उसमे हर जगह सुराख़ थे फिर समझ में की में कश्मीर में हूँ| अगर कुछ देर और बिजली न आती तो मेरी वही ठण्ड में कुल्फी बन जाती और शायद में अल्लाह को प्यारा हो जाता |
हिंदुस्तान इस धरती के उपर दुनिया की सब से गंभीर मसले में फसा हुआ हुआ है: अनपढ़ता से ले कर घोर गरीबी तक| व्यवहारक रूप में अगर बात की जाये तो इस गरीब शेत्र में सात लाख फौजियों  के लिए अरबो डॉलर का खर्चा आता है| अगर हिंदुस्तान के अमिर तबके , हकुमत, और  फ़ौज को कश्मीर के लोगो के बुरे हाल की फिक्कर नही है तो कम से कम उनकी गरीबी की तरफ ही ध्यान लगा ले |
कश्मीर को वहाँ के लोगो की इच्छा के विरुद्ध कब्जे में रखना न तो हिंदुस्तान के लिए फायदेमंद है और न ही वह की अवाम के लिए, निश्चित ही यह गैर जमुहुरी और वेह्शी है....... और बिलकुल ही गैर जरुरी है |
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फिर भी कश्मीर में आपका स्वागत है| इस की खूबसरती सच में ही दन्त कथाये लगती है |इस की झीले, परबत मालाए, गहरी घाटिया और दरिया दिल को छु ले वाले है | लोग बहुत ही नरम सवभाव , आव भगत करने वाले , पर इरादे के बहुत ही पक्के है| कश्मीर लहू लुहान है| इसकी घाटियों को कांटे वाली तारो से ढक दिया गया है| यहाँ की औरतो के साथ जुल्म किये जाते है | यहाँ के मर्दों को यातनाये दी जाती है और उनके अंग काट दिए जाते |कश्मीरी अवाम की  आवाज को दब्बा दिया गया है | उनके एस हाल को दुनिया में कोई नही जानता न ही कोई जानना चाहता |
सात लाख सुरक्षा ताकते 300 लोगो के साथ लड़ रही है | और ये फ़ौज कभी जीत नही सकती| क्यूंकि स्वाभाव सीधा सा है |इतिहास गवाह है दुनिया की  कोई भी ताकत अपनी ताकत से लोगो को नही दबा सकी है जिन लोगो को अपनी आज़ादी बहुत ही प्यारी है||||||